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US 500% Tariff Russian Oil Buyers: क्या आप 500% टैरिफ के लिए तैयार हैं? अगले हफ्ते होगा बड़ा फैसला

दुनिया की अर्थव्यवस्था एक बार फिर उथल-पुथल के दौर में प्रवेश कर रही है। अमेरिका की राजनीति और रूस-यूक्रेन युद्ध के प्रभाव ने वैश्विक व्यापार को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। अब चर्चा का केंद्र है – अमेरिका का संभावित 500% टैरिफ, जिसके बारे में अगले सप्ताह महत्वपूर्ण फैसला लिया जाएगा। यह कदम केवल व्यापारिक रणनीति नहीं बल्कि एक भूराजनीतिक दबाव उपकरण भी माना जा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह बिल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अधिकार देगा कि वे उन देशों पर कड़े टैरिफ लगा सकें जो सस्ते दामों पर रूसी कच्चा तेल (Russian Crude Oil) खरीद रहे हैं और अप्रत्यक्ष रूप से रूस के युद्ध अभियान को आर्थिक रूप से समर्थन दे रहे हैं।

500% Tariff Russian Oil Buyers

500% Tariff Russian Oil Buyers: क्यों बढ़ रहा है अमेरिकी दबाव?

इस समय दुनिया के कई देश रूस से रियायती दरों पर तेल खरीद रहे हैं। इसमें भारत, चीन, ब्राज़ील जैसे बड़े बाजार भी शामिल हैं। रूस के लिए यह तेल राजस्व उसकी अर्थव्यवस्था का बड़ा भाग है, जो युद्ध की लागत को संतुलित करता है।

अमेरिका का तर्क यह है कि जब पश्चिमी देश रूस पर कठोर प्रतिबंध लगा रहे हैं, तब भारत और चीन जैसे देश सस्ते तेल से लाभ कमा रहे हैं। इससे:

  • रूस की फंडिंग बढ़ती है
  • वैश्विक प्रतिबंधों का प्रभाव कमजोर होता है
  • युद्ध लंबा चलता है
  • अमेरिका और यूरोप की रणनीति कमजोर पड़ती है

इसलिए अमेरिका चाहता है कि या तो ये देश रूस से तेल खरीदना कम करें, या फिर व्यापारिक दंड (टैरिफ) झेलें।


टैरिफ कितना बड़ा हो सकता है?

सबसे बड़ा सवाल यही है। वर्तमान प्रस्ताव के मुताबिक राष्ट्रपति को 500% तक का टैरिफ लगाने का अधिकार दिया जा सकता है। यानी अगर कोई देश रूस से तेल खरीदता है और उस उत्पाद का व्यापार अमेरिका से करता है, तो उसे भारी शुल्क देना पड़ सकता है।

इसका संकेत केवल तेल तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका इसे व्यापार, टेक्नोलॉजी, मैन्युफैक्चरिंग और फार्मा जैसे सेक्टरों में भी लागू कर सकता है।


भारत पर इसका क्या असर हो सकता है?

भारत अभी अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रियायती दरों पर रूसी क्रूड खरीदा जिससे दो बड़े फायदे हुए:

  • भारत की रिफाइनिंग कंपनियों का मार्जिन बढ़ा
  • घरेलू ईंधन मूल्य स्थिर रहे

अमेरिका के टैरिफ से भारत पर तीन प्रकार का दबाव बन सकता है:

1. रणनीतिक दबाव

अमेरिका और भारत के रिश्ते मजबूत हैं लेकिन ऊर्जा नीति में दोनों के हित अलग-अलग हैं। भारत ने स्पष्ट कहा है कि उसकी नीति राष्ट्रीय हित पर आधारित है।

2. आर्थिक दबाव

यदि अमेरिका भारतीय निर्यात उत्पादों पर टैरिफ लगाता है तो भारतीय कंपनियाँ प्रभावित होंगी।
मसलन—टेक्सटाइल, फार्मा, आइटी सर्विसेज, मेटल्स और इंजीनियरिंग उत्पाद।

3. भू-राजनीतिक चयन

भारत को अमेरिका, रूस और चीन सभी के बीच संतुलन साधना होता है। एक पक्ष की तरफ झुकाव दूसरे पक्ष को असंतुष्ट कर सकता है।


अमेरिका का मकसद रूस को आर्थिक चोट देना

  • अमेरिका जानता है कि रूस की अर्थव्यवस्था ऊर्जा पर निर्भर है।
  • 2023-24 में रूस की सरकारी आय का बड़ा हिस्सा तेल और गैस निर्यात से आया।

अगर इस आय पर रोक लगाई जाती है तो:

  • रूस के लिए युद्ध जारी रखना मुश्किल होगा
  • यूक्रेन मोर्चे पर उसकी रणनीतिक क्षमता घट सकती है
  • रूस पर बातचीत का दबाव बढ़ सकता है

यही वजह है कि टैरिफ को आर्थिक हथियार के तौर पर देखा जा रहा है।


चीन और ब्राजील पर असर

  • चीन रूस का सबसे बड़ा तेल खरीदार बन चुका है।
  • ब्राजील कृषि और ऊर्जा सौदों में रूस का मजबूत साझेदार है।
  • अमेरिकी बिल दोनों देशों को भी सीधी चुनौती देता है।

अगर चीन प्रतिरोध करता है तो मामला सिर्फ व्यापारिक नहीं बल्कि भू-राजनीतिक टकराव बन जाएगा।

पिछले एक दशक में अमेरिका-चीन संबंध पहले ही व्यापारिक युद्ध, टैरिफ और टेक प्रतिबंधों से गुजर चुके हैं।

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500% Tariff Russian Oil Buyers: भारत का संतुलन और कूटनीति

भारत ने हमेशा रूस को रणनीतिक भागीदार माना है—रक्षा, ऊर्जा और अंतरिक्ष कार्यक्रमों में सहयोग इसका सबूत है।
दूसरी तरफ अमेरिका भी भारत का बड़ा व्यापारिक और टेक सहयोगी है।

इस नए टैरिफ प्रस्ताव से भारत को न तो रूसी ऊर्जा छोड़ना आसान होगा और न ही अमेरिकी बाजार।

भारत के लिए तीन विकल्प होंगे:

  • तेल खरीद चालू रखना
  • रियायती तेल का हिस्सा कम करना
  • वैकल्पिक ऊर्जा खरीद बढ़ाना

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