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जापान ने सुनामी से बचाव के लिए 395 किमी लंबी समुद्री दीवार 9 मिलियन पेड़ों से बनाई

जब हम जापान के बारे में सोचते हैं तो हमारे दिमाग में सबसे पहले हाई-टेक गैजेट्स, बुलेट ट्रेन और परंपरा व आधुनिकता का मेल आता है। लेकिन जापान की कहानी केवल तकनीक तक सीमित नहीं है। यह एक ऐसे देश की कहानी भी है जो लगातार प्रकृति से जूझता रहा है। प्रशांत महासागर से घिरे और दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंपीय ज़ोन में बसे इस देश ने अपनी इतिहास में कई बार भीषण भूकंप और सुनामी देखी है।

395 किमी लंबी समुद्री दीवार

2011 की ग्रेट ईस्ट जापान भूकंप और सुनामी इस देश की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक थी। इसमें 18,000 से अधिक लोगों की जान गई और लाखों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े।

इसी दर्दनाक घटना से जन्म हुआ एक साहसिक विचार का—ऐसा रक्षा कवच बनाने का जो आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित रखे। जापान ने इसके बाद 395 किलोमीटर लंबी समुद्री दीवार बनाई और तटीय क्षेत्रों में 9 मिलियन से अधिक पेड़ लगाए ताकि भविष्य की सुनामियों से बचाव हो सके।

इतनी बड़ी दीवार क्यों बनाई गई?

2011 की सुनामी 9.0 तीव्रता वाले भूकंप से उत्पन्न हुई थी, जिसने 40 मीटर तक ऊँची लहरें भेजीं। इन लहरों ने पूरे कस्बों को मिटा दिया, खेतों को डुबो दिया और हजारों परिवार उजाड़ दिए। इसी से यह स्पष्ट हुआ कि जापान को समुद्र से मजबूत सुरक्षा की जरूरत है। इसलिए सरकार ने मियागी, इवाते और फुकुशिमा तटों पर 395 किमी लंबी और 15 मीटर तक ऊँची कंक्रीट दीवारें बनाईं।ये दीवारें सुनामी की ताकत को तोड़ने और कम करने के लिए डिजाइन की गई हैं।

कंक्रीट के साथ 9 मिलियन पेड़ क्यों लगाए?

दीवारें मजबूत हैं, लेकिन वे अकेली पर्याप्त नहीं। प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखने और दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए जापान ने तटीय क्षेत्रों में लाखों पाइन और ब्रॉडलीफ पेड़ लगाए जिन्हें “ग्रीन वॉल्स” कहा जाता है। ये पेड़:

  • दीवार से पार आने वाली लहरों की ताकत कम करते हैं।
  • मिट्टी कटाव रोकते हैं और तट को सुरक्षित रखते हैं।
  • पक्षियों और जीव-जंतुओं को आश्रय देते हैं।
  • और सबसे अहम, प्रभावित समुदायों के लिए जीवन और आशा का प्रतीक बनते हैं।

लोगों की प्रतिक्रिया

कुछ लोग अब ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं, जबकि कुछ को शिकायत है कि दीवार ने समुद्र का खूबसूरत नज़ारा छिपा दिया। मछुआरों का कहना है कि सुरक्षा ज़रूरी है, लेकिन समुद्र से रिश्ता भी बना रहना चाहिए। यही कारण है कि पेड़ इस परियोजना में अहम भूमिका निभाते हैं—वे कंक्रीट की कठोरता को प्रकृति की गर्माहट से संतुलित करते हैं।

लागत और तकनीकी उपलब्धि

यह परियोजना अरबों डॉलर की लागत से बनी है और दुनिया की सबसे महंगी आपदा-रोधी संरचनाओं में से एक है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सुनामी को पूरी तरह नहीं रोक सकती, लेकिन समय जरूर दिला सकती है,

और यही समय जीवन और मृत्यु के बीच का फर्क हो सकता है।

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दुनिया के लिए सबक

जापान का यह मॉडल उन देशों के लिए प्रेरणा है जो समुद्र और जलवायु परिवर्तन से जूझ रहे हैं।

हर देश जापान जैसी बड़ी परियोजना नहीं बना सकता, लेकिन प्राकृतिक और कृत्रिम समाधानों का यह मेल अनुकरणीय है।

निष्कर्ष

395 किमी लंबी दीवार और 9 मिलियन पेड़ सिर्फ ढांचा नहीं हैं,

यह जापान की जनता के लिए एक वादा है: हमने सीखा है, हम तैयार रहेंगे।

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