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Indian Army’s historic leap: रैमजेट तकनीक के साथ 155mm गोले

भारत की रक्षा क्षमताओं में एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। भारतीय सेना दुनिया में पहली बार 155mm कैलिबर के ऐसे आर्टिलरी गोले तैनात करने की तैयारी में है, जिनमें उन्नत रैमजेट तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। यह उपलब्धि न केवल तकनीकी नवाचार का प्रतीक है, बल्कि आधुनिक युद्धक्षेत्र में भारत की बढ़ती रणनीतिक बढ़त को भी रेखांकित करती है।

Indian Army's historic leap

Indian Army’s historic leap: 155mm रैमजेट शेल,क्या है रैमजेट तकनीक और क्यों है खास?

रैमजेट एक ऐसी प्रोपल्शन तकनीक है जो हवा को संपीड़ित करके ईंधन के साथ जलाती है

और निरंतर थ्रस्ट पैदा करती है। पारंपरिक आर्टिलरी गोलों में जहां केवल शुरुआती फायरिंग के बाद गति धीरे-धीरे कम होती जाती है, वहीं रैमजेट गोले उड़ान के दौरान भी अपनी गति और रेंज बनाए रखते हैं। इसका सीधा लाभ यह है कि गोला ज्यादा दूर तक, अधिक सटीकता के साथ और ज्यादा ऊर्जा के साथ लक्ष्य तक पहुंचता है।


155mm गोले क्यों हैं अहम?

155mm रैमजेट शेल आर्टिलरी कैलिबर दुनिया भर में मानक माना जाता है

और भारत की सेना पहले से ही इसी कैलिबर के आधुनिक हॉवित्जर इस्तेमाल करती है।

रैमजेट तकनीक के जुड़ने से इन्हीं प्रणालियों की मारक क्षमता में गुणात्मक उछाल आएगा।

इससे सीमा पार या दूरस्थ लक्ष्यों पर प्रभावी कार्रवाई संभव होगी, साथ ही प्रतिक्रिया समय भी कम होगा।


दुनिया में पहली बार—भारत की बढ़त

इस तैनाती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि 155mm रैमजेट आर्टिलरी शेल का ऑपरेशनल उपयोग दुनिया में पहली बार होने जा रहा है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम भारत को आर्टिलरी टेक्नोलॉजी के अग्रिम पंक्ति में खड़ा करता है। इससे न केवल सैन्य संतुलन में भारत की स्थिति मजबूत होगी, बल्कि स्वदेशी नवाचार पर आधारित रक्षा समाधान भी वैश्विक मंच पर पहचान पाएंगे।


आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम

रैमजेट आधारित 155mm गोले आत्मनिर्भर भारत की रक्षा रणनीति के अनुरूप हैं।

स्वदेशी अनुसंधान, डिजाइन और परीक्षण से विकसित इस तकनीक ने यह साबित किया है

कि भारत उच्च स्तरीय रक्षा प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भर बन सकता है।

इससे आयात पर निर्भरता घटेगी और दीर्घकाल में लागत प्रभावी समाधान उपलब्ध होंगे।


रणनीतिक लाभ और युद्धक्षेत्र में असर

इन गोलों की बढ़ी हुई रेंज और सटीकता से सेना को कई रणनीतिक फायदे मिलेंगे।

कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी दूरस्थ लक्ष्यों पर प्रभावी फायर संभव होगा। साथ ही, काउंटर-बैटरी फायर में बढ़त मिलेगी और दुश्मन की आर्टिलरी को सुरक्षित दूरी से निष्क्रिय किया जा सकेगा। यह आधुनिक युद्ध की मांग—तेज, सटीक और दूरगामी प्रभाव—को पूरा करता है।


परीक्षण से तैनाती तक का सफर

रैमजेट तकनीक वाले आर्टिलरी गोलों का विकास और परीक्षण एक जटिल प्रक्रिया रही है।

एयरोडायनेमिक्स, ईंधन प्रबंधन, थर्मल स्थिरता और मार्गदर्शन—हर स्तर पर कठोर परीक्षण किए गए। सफल परीक्षणों के बाद अब इन्हें चरणबद्ध तरीके से तैनात करने की तैयारी है, ताकि फील्ड कंडीशंस में भी इनकी विश्वसनीयता सुनिश्चित की जा सके।

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Indian Army’s historic leap: भविष्य की तैयारी

रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि यह शुरुआत आगे और उन्नत आर्टिलरी समाधानों का मार्ग खोलेगी जैसे बेहतर मार्गदर्शन, नेटवर्क-सेंट्रिक ऑपरेशंस के साथ एकीकरण और विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर अनुकूलता।

155mm रैमजेट तकनीक वाले आर्टिलरी गोले तैनात करने जा रही है। यह कदम मारक क्षमता और आत्मनिर्भर रक्षा की दिशा में बड़ा बदलाव है

इससे सेना की समग्र फायरपावर और लचीलापन बढ़ेगा।

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