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AI ग्लासेस का नया डेमो और बढ़ती चिंताएँ – क्या सड़क पर मिलने वाले हर व्यक्ति की पहचान रिकॉर्ड की जाएगी?

तकनीक तेजी से विकसित हो रही है, और इसी तेज बदलाव के बीच सामने आया AI ग्लासेस का हालिया डेमो, जिसने दुनिया भर में गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस डेमो में दिखाया गया कि AI चश्मे पहनने वाला व्यक्ति सड़क पर चलते समय किसी अजनबी का चेहरा देखकर उसका नाम, पता, पेशा और अन्य विवरण कुछ सेकंड में जान सकता है।

AI ग्लासेस

देखने में यह सुविधा बेहद उन्नत और रोमांचक लगती है, लेकिन इसके साथ जुड़ी प्राइवेसी चिंताएँ काफी गंभीर हैं।

क्या तकनीक अब इतनी आगे बढ़ गई है

कि हमारी पहचान हमारी अनुमति के बिना सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो जाएगी?

यह सवाल अरबों लोगों को चिंतित कर रहा है।


AI ग्लासेस कैसे काम करते हैं?

डेमो के अनुसार AI ग्लासेस में-

  • फेस रिकग्निशन तकनीक
  • रीयल-टाइम डेटा प्रोसेसिंग
  • क्लाउड से जुड़ा डेटाबेस
  • संदर्भ-आधारित पहचान प्रणाली

का संयोजन है।

चश्मा पहनने वाला व्यक्ति केवल किसी को देखता है, और कुछ ही क्षणों में AI उसके चेहरे का विश्लेषण कर लेता है।

यदि उस व्यक्ति की तस्वीर किसी ऑनलाइन डेटाबेस, सोशल मीडिया, सरकारी रिकॉर्ड या किसी सार्वजनिक स्रोत में उपलब्ध है, तो AI तुरंत जानकारी खींचकर चश्मे की स्क्रीन पर दिखा देता है।

तकनीक के स्तर पर यह एक उपलब्धि है, लेकिन सामाजिक स्तर पर यह बड़ी चुनौती बन सकती है।


सबसे बड़ा सवाल – क्या आपकी अनुमति जरूरी नहीं होगी?

फेस रिकग्निशन तकनीक पहले भी आलोचना में रही है,

लेकिन AI ग्लासेस का यह नया रूप गोपनीयता को एक नए खतरे में डालता है।

एक सामान्य नागरिक सड़क पर चलता है

इस भरोसे के साथ कि कोई उसकी निजी जानकारी बिना उसकी अनुमति के प्राप्त नहीं कर सकता।

लेकिन यदि AI चश्मा आपका नाम, पता या पेशा अपने आप पहचान ले, तो यह आपके अधिकारों का उल्लंघन माना जा सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि-

  • यह तकनीक स्टॉकिंग को बढ़ावा दे सकती है
  • अपराधी इसका दुरुपयोग कर सकते हैं
  • लोगों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है
  • व्यक्तियों की निजी जिंदगी पूरी तरह एक्सपोज़ हो सकती है

इसलिए सरकारें और तकनीकी कंपनियाँ गोपनीयता से जुड़े कानूनों पर विचार कर रही हैं।


लोगों की चिंताएँ – एक तरफ सुविधा, दूसरी तरफ खतरनाक भविष्य

AI ग्लासेस को लेकर सोशल मीडिया पर बहस तेज है। लोग कह रहे हैं कि:

  • “क्या अब सड़क पर चलते समय भी खुद को छिपाना पड़ेगा?”
  • “अगर कोई मेरा नाम-पता जान जाए तो क्या मैं सुरक्षित रहूँगा?”
  • “क्या बच्चों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी?”
  • “क्या यह हमारे ‘राइट टू प्राइवेसी’ का उल्लंघन नहीं है?”

इस तकनीक ने आम जनजीवन में बुनियादी स्वतंत्रता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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सरकार और विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं?

गोपनीयता विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी तकनीक बिना कठोर नियमों के लागू नहीं की जानी चाहिए।

सरकारें विचार कर रही हैं-

  • फेस रिकग्निशन को अनुमति आधारित बनाया जाए
  • नागरिकों का डेटा सुरक्षित रखा जाए
  • AI डिवाइसेज़ के लिए लाइसेंस नीति लागू हो
  • गलत उपयोग पर कड़े दंड लागू किए जाएं

कई देशों में पहले ही फेस रिकग्निशन तकनीक के उपयोग पर प्रतिबंध या सीमाएँ लगाई जा चुकी हैं।

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