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इस्लाम में ‘कबूल है’ तीन बार क्यों कहा जाता है? जानिए असली वजह

भारत में जब भी मुस्लिम निकाह की बात होती है, तो सबसे पहले दिमाग में यही दृश्य आता है – काजी सवाल पूछते हैं और दूल्हा-दुल्हन तीन बार कहते हैं, “कबूल है… कबूल है… कबूल है।”

कबूल है तीन बार क्यों

लेकिन क्या आप जानते हैं कि कबूल है तीन बार क्यों कहने की परंपरा का असली कारण क्या है?

क्या एक बार कहने से निकाह पूरा नहीं होता?

क्या यह इस्लामी कानून का हिस्सा है या सिर्फ एक सांस्कृतिक परंपरा?

आइए पूरी सच्चाई समझते हैं।


निकाह का मूल सिद्धांत: ‘इजाब और कुबूल’

इस्लाम में विवाह का आधार बहुत सरल है।

दोनो पक्षों की स्पष्ट सहमति के बिना निकाह नहीं हो सकता।

निकाह दो चरणों में पूरा होता है:

  1. इजाब – यानी प्रस्ताव (काजी या वली के जरिए)
  2. कुबूल – यानी स्वीकार (दूल्हा या दुल्हन द्वारा)

इस्लामी फिक्ह (धार्मिक कानून) के अनुसार –

यदि इजाब और कुबूल एक ही बार और स्पष्ट रूप से कह दिया जाए, तो निकाह वैध माना जाता है।

इसका मतलब यह है कि एक बार “कबूल है” कहना भी निकाह के लिए पर्याप्त है, बशर्ते कि:

  • दोनों पक्ष पूरी तरह समझते हों
  • बात साफ और स्पष्ट हो
  • गवाह मौजूद हों
  • मेहर तय हो

लेकिन फिर तीन बार कहने की परंपरा कहाँ से आई?


“कबूल है तीन बार क्यों” कहने का असली कारण धार्मिक, सामाजिक और व्यवहारिक है

इस्लामी न्यायशास्त्र में “तीन बार” कहना फर्ज़ नहीं, लेकिन इसे मुस्तहब (अच्छा और अनुशंसित कार्य) माना गया है।

1. सुनिश्चित सहमति का प्रमाण

निकाह जीवन का गंभीर अनुबंध है।

एक बार में कोई अस्पष्टता न रह जाए, इसलिए तीन बार पूछना और तीन बार कहना सहमति की मजबूत पुष्टि मानी जाती है।

2. गवाहों के लिए स्पष्ट संकेत

इस्लाम में निकाह तभी वैध है जब:

  • कम से कम दो गवाह
  • बात को साफ-साफ सुनें और समझें

तीन बार उच्चारण करने से:

  • गवाहों को पुष्टि होती है
  • कोई भ्रम नहीं रहता
  • निकाह पर बाद में कोई विवाद खड़ा नहीं होता

3. परंपरा और सुन्नती तरीका

कई इस्लामी विद्वानों के अनुसार तीन बार दोहराना “ताकीद” यानी पक्के प्रमाण के लिए किया जाता है।

यह तरीका कई देशों में सदियों से अपनाया जा रहा है, जिससे यह परंपरा का हिस्सा बन गया।

4. निर्णय की गंभीरता और मानसिक तैयारी

निकाह सिर्फ कानूनी नहीं, आध्यात्मिक और सामाजिक जिम्मेदारी भी है।

तीन बार कहने से:

  • मन में दृढ़ता आती है
  • कोई दबाव नहीं होने का संकेत मिलता है
  • दोनों पक्षों को आत्मविश्वास मिलता है

क्या सिर्फ एक बार ‘कबूल है’ कहने से निकाह वैध है?

हाँ, शरिया के अनुसार:

“एक बार कुबूल कहना भी निकाह के लिए पर्याप्त है।”

लेकिन बशर्ते:

  • आवाज स्पष्ट हो
  • गवाह सुन रहे हों
  • कोई खामोशी या गलतफहमी न हो
  • इजाब और कुबूल एक ही مجلس में हों

तीन बार कहना अनिवार्य नहीं, लेकिन इसे अधिक सुरक्षित, स्पष्ट और पारंपरिक माना जाता है।

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क्यों बना यह आम जनता में अनिवार्यता जैसा?

सालों से समाज में देखा गया है:

  • फिल्मों में
  • टीवी शो में
  • निकाह की रस्मों में

हर जगह “कबूल है” तीन बार दिखाया जाता है, इसलिए लोगों को लगा कि यह इस्लाम की अनिवार्य शर्त है।

वास्तव में यह परंपरागत और व्यवहारिक तरीका है, न कि फर्ज या अनिवार्य हुक्म।

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