रक्षाबंधन पर प्रेमानंद महाराज का दृष्टिकोण
भारत के प्रमुख पर्वों में से एक रक्षाबंधन को पूरे देश में प्रेम और उत्साह के साथ मनाया जाता है। बहुत से लोग इसे भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक मानते हैं, लेकिन आदरणीय संत प्रेमानंद महाराज इस पावन पर्व को एक गहरी, आध्यात्मिक दृष्टि से समझाते हैं।

रक्षाबंधन: केवल एक धागा नहीं
प्रेमानंद महाराज के अनुसार रक्षाबंधन सिर्फ एक सुंदर धागा (राखी) बांधने का नाम नहीं है, बल्कि यह एक पवित्र संकल्प — “रक्षा संकल्प” — है। यह वचन है सुरक्षा, पवित्रता और करुणा का, जो रिश्तों की सीमाओं से परे जाता है।
महाराज अपने भक्तों को बताते हैं कि राखी यह संकेत देती है कि परमात्मा स्वयं हमारी रक्षा कर रहे हैं। यदि यह प्रेम और शुद्ध भाव से बांधी जाए तो यह बांधने और बंधवाने वाले दोनों को ईश्वरीय आशीर्वाद देती है। यह पैसों या भौतिक उपहारों का विषय नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जुड़ाव और धर्मपालन का प्रतीक है।
पौराणिक कथाओं की जड़ें
महाराज के अनुसार, रक्षाबंधन का वास्तविक अर्थ हमारे प्राचीन शास्त्रों में निहित है।
वे अक्सर भागवत पुराण, महाभारत और लोककथाओं से उदाहरण देते हैं।
- द्रौपदी और कृष्ण — द्रौपदी ने कृष्ण की उंगली से रक्त बहने पर अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर बांध दिया। यह अनजाने में ही सुरक्षा के आध्यात्मिक बंधन का प्रारंभ था, जिसका प्रतिफल कृष्ण ने ‘चीर हरण’ में उनकी रक्षा करके दिया।
- इंद्र और इंद्राणी — असुरराज बली से युद्ध से पहले इंद्राणी ने इंद्र की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा, जिससे यह पर्व आस्था और विजय का प्रतीक बन गया।
इन कथाओं से महाराज बताते हैं कि रक्षाबंधन सिर्फ भाई-बहन का पर्व नहीं है,
बल्कि धर्म की रक्षा और जरूरतमंद की सहायता का भी संदेश देता है।
सुरक्षा का दायरा बढ़ाना
प्रेमानंद महाराज मानते हैं कि रक्षाबंधन की असली खूबसूरती यह है कि इसका संदेश सभी तक पहुंचे — परिवार, मित्र, सैनिक, यहां तक कि प्रकृति तक।
उनके शब्दों में —
“राखी बांधने वाला केवल सुरक्षा मांगता ही नहीं, बल्कि सुरक्षा देने का भी वचन देता है।”
सैनिकों को आभार स्वरूप राखी बांधें, या पेड़ों पर रक्षा सूत्र बांधकर प्रकृति की रक्षा का संकल्प लें।
यह “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को पुनः जीवित करता है।
शुद्ध भाव का महत्व
महाराज के अनुसार, राखी बांधते समय हृदय में प्रेम और पवित्रता होनी चाहिए।
बांधने वाला दूसरे के कल्याण के लिए प्रार्थना करे और पाने वाला उसकी रक्षा का संकल्प ले।
उपवास, भजन और प्रभु का नामस्मरण इस दिन के आध्यात्मिक प्रभाव को और बढ़ा देता है।
आधुनिक समय में रक्षाबंधन
आज महाराज लोगों को चेतावनी देते हैं कि इस पर्व को केवल भौतिक उपहारों का लेन-देन न बनाएं।
इसके मूल में निहित प्रेम, विश्वास और एकता की भावना को जीवित रखना जरूरी है।
यह पर्व हमें परस्पर सम्मान और जिम्मेदारी की याद दिलाता है।
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निष्कर्ष
प्रेमानंद महाराज के लिए रक्षाबंधन आत्मा का पर्व है
— केवल भाई-बहन के लिए नहीं, बल्कि समस्त प्राणीमात्र, समाज और प्रकृति के लिए प्रेम और सुरक्षा का संकल्प लेने का अवसर है। उनके विचार हमें याद दिलाते हैं कि यह पवित्र धागा केवल सजावट नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक वचन है जो शांति और ईश्वरीय आशीर्वाद ला सकता है।
इस रक्षाबंधन, आइए हम केवल कलाई पर ही नहीं, बल्कि अपने हृदयों पर भी रक्षा का सूत्र बांधें — प्रेम, विश्वास और एकता के साथ।
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