दिवाली और गुरु पूर्णिमा: कब मनाई जाती हैं और क्या है धार्मिक महत्व
भारत की संस्कृति और अध्यात्म अपने त्योहारों में जीवंत दिखाई देता है। इन्हीं में से दो प्रमुख पर्व हैं दिवाली और गुरु पूर्णिमा, जो दोनों ही धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हालांकि इनका समय और अर्थ भिन्न है, फिर भी इनका उद्देश्य मानवता, कृतज्ञता और प्रकाश का संदेश देना है।

कई लोग यह जानना चाहते हैं कि दिवाली और गुरु पूर्णिमा का क्या अर्थ है, क्यों मनाई जाती हैं, और क्या कभी दोनों एक ही दिन पड़ सकती हैं। आइए जानते हैं इन दोनों पवित्र त्योहारों के बारे में विस्तार से।
दिवाली क्यों मनाई जाती है?
दीपावली, जिसे आमतौर पर दिवाली कहा जाता है, भारत का सबसे लोकप्रिय और व्यापक रूप से मनाया जाने वाला त्योहार है।
“दीपावली” शब्द संस्कृत के “दीप” (दीया) और “आवली” (श्रृंखला) से बना है, जिसका अर्थ है दीयों की पंक्ति।
यह त्योहार अंधकार पर प्रकाश की, बुराई पर अच्छाई की, और अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है।
धार्मिक दृष्टि से दिवाली का महत्व
- हिंदू धर्म में दिवाली वह दिन है जब भगवान राम 14 वर्षों के वनवास और रावण पर विजय के बाद अयोध्या लौटे थे। लोगों ने उनके स्वागत में घरों को दीयों और आतिशबाज़ी से रोशन किया।
- जैन धर्म में दिवाली का दिन भगवान महावीर के निर्वाण (मोक्ष प्राप्ति) का प्रतीक है।
- सिख धर्म में यह दिन गुरु हरगोबिंद सिंह जी की जेल से मुक्ति के रूप में “बंदी छोड़ दिवस” के रूप में मनाया जाता है।
- बौद्ध धर्म के कुछ अनुयायी इसे अशोक विजयादशमी के रूप में मनाते हैं, जो सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म अपनाने का संकेत है।
यह पांच दिवसीय पर्व मां लक्ष्मी (समृद्धि), भगवान गणेश (ज्ञान) की पूजा और दीप जलाने की परंपरा से जुड़ा हुआ है।
गुरु पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है?
- गुरु पूर्णिमा एक पवित्र पर्व है जो गुरुओं, शिक्षकों और आध्यात्मिक मार्गदर्शकों को समर्पित है।
- संस्कृत में “गुरु” शब्द का अर्थ है — “अंधकार को मिटाने वाला।”
- अर्थात गुरु वह होता है जो अपने शिष्य के जीवन में ज्ञान और प्रकाश लाता है।
गुरु पूर्णिमा का धार्मिक महत्व
- यह दिन महार्षि वेदव्यास के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है, जिन्होंने वेदों का संकलन और महाभारत की रचना की।
- हिंदू परंपरा में वेदव्यास को आदि गुरु (पहले शिक्षक) माना जाता है।
- यह पर्व आषाढ़ महीने की पूर्णिमा को मनाया जाता है (आमतौर पर जून-जुलाई में)।
- बौद्ध धर्म में यह वह दिन है जब भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद सारनाथ में अपना पहला उपदेश दिया था।
- जैन धर्म में यह दिन उस समय को दर्शाता है जब भगवान महावीर ने अपने शिष्य गौतम स्वामी को दीक्षा दी।
इस दिन शिष्य अपने शिक्षकों को धन्यवाद देते हैं, धार्मिक ग्रंथों का पाठ करते हैं
और विनम्रता तथा कृतज्ञता के भाव प्रकट करते हैं।
क्या दिवाली और गुरु पूर्णिमा एक ही दिन पड़ सकती हैं?
हालांकि दोनों त्योहार पूर्णिमा (पूर्ण चंद्रमा) से जुड़े हैं, लेकिन ये अलग-अलग महीनों में पड़ते हैं।
- गुरु पूर्णिमा — आषाढ़ पूर्णिमा को मनाई जाती है, जो आमतौर पर जून-जुलाई में होती है।
- दिवाली — अमावस्या (नया चांद) के दिन मनाई जाती है, जो कार्तिक महीने (अक्टूबर-नवंबर) में आती है।
- जबकि देव दीपावली (या देव दिवाली) कार्तिक पूर्णिमा को मनाई जाती है, यानी दिवाली के लगभग 15 दिन बाद।
इसलिए यह दोनों त्योहार कभी एक ही दिन नहीं पड़ते,
क्योंकि एक पूर्णिमा को और दूसरा अमावस्या को मनाया जाता है।
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दिवाली और गुरु पूर्णिमा का धार्मिक महत्व और सार
दिवाली अच्छाई की जीत, धन और प्रकाश की वापसी, और आत्मा के नवीकरण का प्रतीक है।
यह परिवारों और समाज में खुशी और एकता लाती है।
वहीं, गुरु पूर्णिमा अपने जीवन में उन लोगों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का दिन है
जिन्होंने हमें सिखाया, मार्गदर्शन दिया और आत्मिक विकास में मदद की।
हालांकि दिवाली और गुरु पूर्णिमा अलग-अलग समय पर मनाई जाती हैं,
लेकिन दोनों त्योहार एक ही सार्वभौमिक मूल्यों को दर्शाते हैं — कृतज्ञता, ज्ञान और आशा।
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