धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री और प्रेमानंद महाराज की मुलाकात: वृंदावन में आध्यात्मिक एकता का क्षण
वृंदावन में एक भावनात्मक और प्रेरक दृश्य देखने को मिला जब धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री और प्रेमानंद महाराज की मुलाकात राधा केली कुंज आश्रम में हुई। बागेश्वर धाम पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने संत प्रेमानंद महाराज से अचानक भेंट की, जिससे भक्तों के बीच अपार उत्साह फैल गया।

यह मुलाकात न केवल भावनात्मक थी बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत प्रेरणादायक रही। दोनों महान संतों ने “सनातन धर्म सद्भावना यात्रा” पर चर्चा की — यह यात्रा दिल्ली से वृंदावन तक निकाली जाएगी, जिसका उद्देश्य हिंदू समाज में एकता, शांति और आध्यात्मिक जागरण को बढ़ावा देना है।
आध्यात्मिक विचारों का संगम
सप्ताह की शुरुआत में हुई धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री और प्रेमानंद महाराज की मुलाकात ने भक्तों के बीच श्रद्धा की नई लहर पैदा कर दी। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री, जो अपने प्रेरक प्रवचनों के लिए प्रसिद्ध हैं, ने प्रेमानंद महाराज से उनके स्वास्थ्य का हालचाल पूछा और आगामी यात्रा के लिए आशीर्वाद लिया।
प्रेमानंद महाराज, जो राधा-कृष्ण भक्ति और गहन दार्शनिक विचारों के लिए जाने जाते हैं, ने शास्त्रीजी का स्नेहपूर्वक स्वागत किया। दोनों संतों ने समाज में एकता, करुणा और सकारात्मक ऊर्जा के प्रसार पर विस्तृत चर्चा की।
सनातन धर्म सद्भावना यात्रा: दिल्ली से वृंदावन तक
बैठक के दौरान धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने बताया कि “सनातन धर्म सद्भावना यात्रा” 7 नवंबर से 16 नवंबर 2025 तक आयोजित होगी, जो दिल्ली से वृंदावन तक लगभग 170 किलोमीटर की दूरी तय करेगी।
इस यात्रा का उद्देश्य धर्मिक सद्भाव, सहिष्णुता और सनातन मूल्यों को मजबूत करना है।
हजारों श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल होंगे, जिसमें भजन-कीर्तन, प्रवचन और सामूहिक प्रार्थना के कार्यक्रम होंगे।
शास्त्रीजी ने कहा —
“यह यात्रा केवल आस्था का प्रदर्शन नहीं, बल्कि यह संदेश है कि सनातन धर्म मानवता की मूल आत्मा है — राजनीति और विभाजन से परे।”
महाराज प्रेमानंद ने शास्त्रीजी के इस प्रयास की सराहना की और कहा कि सनातन धर्म की जड़ करुणा, ज्ञान और एकता में निहित है। उन्होंने कहा कि ऐसी यात्राएँ समाज में भक्ति की भावना को जीवित रखती हैं।
प्रेमानंद महाराज का आध्यात्मिक दृष्टिकोण
किडनी की गंभीर समस्या के बावजूद संत प्रेमानंद महाराज आध्यात्मिक रूप से सक्रिय हैं।
वे सप्ताह में कई बार डायलिसिस के बावजूद अपने आश्रम में प्रवचन और साधना जारी रखते हैं।
उन्होंने शास्त्रीजी से वार्ता के दौरान कहा —
“सनातन धर्म सूर्य की तरह है — यह वायु, आकाश और पृथ्वी की आत्मा है। यह सृष्टि का सार है।”
महाराज ने लोगों से अपील की कि वे आधुनिक जीवन की नकारात्मकता से बचने के लिए अपनी आध्यात्मिक जड़ों से पुनः जुड़ें। उन्होंने शास्त्रीजी को आशीर्वाद देते हुए कहा —
“जहाँ-जहाँ प्रभु का नाम गूँजेगा, वहाँ अंधकार मिटेगा और ईश्वर का प्रकाश फैलेगा।”
आस्था, एकता और सनातन का भविष्य
जैसे ही दोनों संतों की मुलाकात की खबर फैली, वृंदावन के राधा केली कुंज आश्रम के बाहर भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी।
सोशल मीडिया पर इस मुलाकात के वीडियो और तस्वीरें वायरल हो गईं,
जिससे देशभर में भक्तों में उत्साह और श्रद्धा की नई लहर दौड़ गई।
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यह मुलाकात भारत में आध्यात्मिक एकता का प्रतीक बन गई है।
दोनों संतों ने यह दिखाया कि सनातन धर्म केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन का मार्ग है,
— जो एकता, प्रेम और करुणा सिखाता है।
ऐसे समय में जब धर्म को लेकर अनेक भ्रम और विभाजन देखे जा रहे हैं,
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री और प्रेमानंद महाराज की मुलाकात एक सकारात्मक संदेश लेकर आई है।
यह एक भेंट, दो संतों का मिलन, जो राष्ट्र को आध्यात्मिक रूप से जोड़ने की दिशा में अग्रसर हैं।
जैसे धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री “सनातन धर्म सद्भावना यात्रा” पर निकलने की तैयारी कर रहे हैं,
प्रेमानंद महाराज का आशीर्वाद इस यात्रा को और भी पवित्र बना रहा है।
यह मुलाकात एक प्रतीक है — कि सनातन धर्म शाश्वत, समावेशी और सदा मार्गदर्शक है।
Disclaimer: यह लेख एक सामाजिक पोस्ट या अनुसंधान पर आधारित है। खबरबॉक्स इन तथ्यों की पुष्टि नहीं करता है।
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