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अविमुक्तेश्वरानंदजी ने रामभद्राचार्यजी से पूछा, “अगर आप देख नहीं सकते तो क्या सुन भी नहीं सकते?”

भारत के धार्मिक क्षेत्र को लोग अक्सर विचार, प्रार्थना और सम्मान का शांत वातावरण मानते हैं। लेकिन हाल में अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा जगद्गुरु रामभद्राचार्य को भेजा गया संदेश सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। अविमुक्तेश्वरानंद ने तीखा सवाल करते हुए पूछा, “अगर आप देख नहीं सकते, तो क्या आप सुन भी नहीं सकते?” “आप रोज संस्कृत बोलते हैं, फिर भगवान के बारे में दूसरे भाषा में प्रवचन देने की जरुरत क्यों?” इस बयान ने विश्वास, संवाद और अध्यात्मिक शिक्षा की आत्मा को नए तरीके से सोचने को मजबूर किया है।

अविमुक्तेश्वरानंदजी

आध्यात्मिक अनुभूति में इन्द्रियों की भूमिका

रामभद्राचार्य संस्कृत ग्रंथों और वैदिक परंपरा के ज्ञानी माने जाते हैं। अविमुक्तेश्वरानंद का जवाब सीधा था

– क्या इन्द्रियों की सीमाएँ आध्यात्मिक सत्य को जानने में बाधक हैं?

उन्होंने कहा, “शुद्ध आत्मा के जरिये भगवान की अनुभूति प्रार्थना व समर्पण से होती है, केवल इंद्रियों से नहीं।”


भाषा का अध्यात्मिक शिक्षण में स्थान

“आप रोज संस्कृत बोलते हैं, तो भगवान के बारे में दूसरी भाषा की जरूरत क्या?”—ये सवाल गहराई से जुड़ता है। संस्कृत को धार्मिकता और योग की पवित्र भाषा माना जाता है, पर अविमुक्तेश्वरानंद का मानना है कि ईश्वर का संदेश हर किसी के लिए है। हिन्दी, संस्कृत या इंग्लिश—हर भाषा में भगवान का भाव समझा जा सकता है। भाषा का आग्रह ईश्वर की अनुभूति का दायरा सीमित करता है।


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किसके पास है आध्यात्मिक सत्य?

यह विवाद सिर्फ भाषा या इंद्रिय संबंधी योग्यता तक सीमित नहीं है।

ये सवाल उठता है—आध्यात्मिक सत्य किसके पास है और किस तरह प्रसारित होना चाहिए?

कुछ लोग मानते हैं कि संस्कृत सदैव प्रधान रहे, वहीं कुछ मानते हैं कि समर्पण हर संस्कृति, भाषा और योग्यता का सम्मान करे।


आस्था, संवाद और सार्वजनिक प्रतिक्रिया

अविमुक्तेश्वरानंद के सवाल ने विद्वानों और श्रद्धालुओं में बहस शुरू कर दी।

कई लोग मानते हैं कि ऐसी बातें सार्वजनिक तौर पर उठनी चाहिए ताकि किसी को भी भाषा या योग्यता के कारण बाहर न किया जाए।

कुछ लोग सार्वजनिक मंच पर ऐसे विवादों को अनुचित मानते हैं।


अविमुक्तेश्वरानंद की टिप्पणी हमें याद दिलाती है—आध्यात्म सिर्फ इंद्रियों से नहीं, आस्था, आत्म-संपर्क और भावनाओं से जुड़ा है। भगवान तक पहुंचने के लिए भाषा, संस्कार या स्वरूप की सीमा नहीं; सच्चा श्रद्धा और समर्पण ही रास्ता है।

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