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H-1B वीज़ा प्रतिबंध हटाने की मांग: अमेरिकी सांसद बोले – एआई के लिए भारतीय प्रतिभा जरूरी

अमेरिकी टेक उद्योग में इस समय एक तीखी बहस छिड़ी हुई है, क्योंकि कई अमेरिकी सांसदों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से H-1B वीज़ा प्रतिबंध हटाने की मांग की है। उनका कहना है कि यह कदम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और अमेरिका-भारत साझेदारी पर गहरा असर डाल सकता है। आज जब पूरी दुनिया एआई नवाचार की दौड़ में है, तो विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय पेशेवरों की भूमिका अमेरिका की तकनीकी श्रेष्ठता बनाए रखने में निर्णायक है।

H-1B वीज़ा प्रतिबंध

H-1B वीज़ा विवाद और उसके प्रभाव

सितंबर 2025 में ट्रंप प्रशासन ने एक नया आदेश जारी किया, जिसके तहत H-1B वीज़ा प्रतिबंध को कड़ा करते हुए 100,000 डॉलर की अग्रिम फीस लागू की गई। प्रशासन का दावा था कि यह कदम अमेरिकी नौकरियों की रक्षा के लिए है, लेकिन उद्योग जगत का कहना है कि इससे स्टार्टअप्स और टेक कंपनियों के लिए प्रतिभाशाली इंजीनियरों को नियुक्त करना मुश्किल हो जाएगा।

यह कदम भारतीय पेशेवरों पर विशेष रूप से असर डालेगा,

क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में लगभग तीन-चौथाई H-1B वीज़ा धारक भारत से रहे हैं।

कई सांसदों और इमीग्रेशन विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह प्रतिबंध “नवाचार को रोक देगा, स्टार्टअप्स की वृद्धि को धीमा करेगा, और प्रतिभाशाली भारतीय इंजीनियरों को अन्य देशों की ओर धकेल देगा।”


अमेरिकी सांसदों की अपील

अमेरिकी कांग्रेस के द्विदलीय समूह ने राष्ट्रपति ट्रंप से H-1B वीज़ा प्रतिबंध हटाने की औपचारिक अपील की है।

उन्होंने अपने पत्र में यह प्रमुख बिंदु रखे:

  • H-1B कार्यक्रम अमेरिकी विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) प्रतिस्पर्धा की रीढ़ है।
  • भारतीय पेशेवर अमेरिकी AI और IT नेतृत्व के केंद्र में हैं — वे पेटेंट निर्माण, स्टार्टअप विकास और रिसर्च में अहम भूमिका निभाते हैं।
  • नए प्रतिबंध नवाचार को नुकसान पहुंचाएंगे और अमेरिका की तकनीकी बढ़त को खतरे में डाल देंगे।

कांग्रेस सदस्य जिमी पनैटा ने कहा,

“H-1B वीज़ा कार्यक्रम वह कारण है जिससे अमेरिका तकनीकी नवाचार में अग्रणी बना हुआ है — और एआई के इस नए युग में इसकी आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।”


भारतीय प्रतिभा पर अमेरिका की निर्भरता

2025 में जारी सभी H-1B वीज़ाओं में से लगभग आधी प्रोफेशनल और टेक्निकल सेवाओं के लिए दी गईं,

जिनमें Google, Microsoft, और Meta जैसी कंपनियाँ प्रमुख हैं।

अमेरिकी अकादमिक और उद्योग जगत का कहना है कि देश के भीतर एआई विशेषज्ञों की कमी है,

और प्रतिबंध लगाने से नवाचार की गति धीमी हो सकती है।

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अमेरिका-भारत सहयोग का अहम मोड़

भारत हर साल दो मिलियन से अधिक STEM स्नातक तैयार करता है और एआई शोध में अग्रणी है।

ऐसे में H-1B वीज़ा प्रतिबंध न केवल वीज़ा नीति का मामला है, बल्कि डिजिटल युग में गहरे रणनीतिक सहयोग की परीक्षा भी है। अमेरिकी सांसदों ने कहा कि भारतीय प्रतिभा को खुले अवसर मिलना अमेरिका की अर्थव्यवस्था और लोकतांत्रिक साझेदारी दोनों के लिए आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि,

“इस कार्यक्रम को सीमित करने के बजाय, इसे अधिक कंपनियों और प्रतिभाशाली व्यक्तियों के लिए विस्तारित किया जाना चाहिए।”


जैसे-जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मांग बढ़ रही है, कुशल भारतीय इंजीनियरों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण होती जा रही है।
अमेरिकी नेता और उद्योगपति मानते हैं कि H-1B वीज़ा प्रतिबंध हटाना न केवल नवाचार को गति देगा बल्कि अमेरिका-भारत संबंधों को भी मजबूत बनाएगा।

यह निर्णय हजारों पेशेवरों के करियर और वैश्विक तकनीकी नेतृत्व की दिशा तय करेगा।

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