प्रशांत किशोर ने राजनीति छोड़ने की नई घोषणा: बिहार में हार के बाद नई दिशा की ओर कदम
प्रशांत किशोर ने राजनीति छोड़ने के लिए नया समयसीमा और शर्तें रखीं, साथ ही मौन व्रत की भी घोषणा की है। 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों में जन-सुराज पार्टी की असफलता के बाद, प्रशांत किशोर ने मुख्य रूप से अपनी पार्टी की हार की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ली है और अपने मिशन को जारी रखने का संकल्प प्रकट किया है।

हार की जिम्मेदारी और आत्मनिरीक्षण
प्रशांत किशोर ने माना कि चुनाव प्रचार के दौरान जनता को प्रभावी ढंग से यह समझाने में वे असफल रहे कि क्यों बिहार में बदलाव आवश्यक है और उनका शासन क्यों वोट के काबिल है।
उन्होंने कहा, “अगर जनता ने हमपर भरोसा नहीं किया, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी मेरी है।”
हार के बाद उन्होंने एक दिन का मौन व्रत रखने का ऐलान किया,
जो कि गांधी भीतिहारवा आश्रम में 20 नवंबर को रखा जाएगा।
यह व्रत उनके द्वारा जनता से माफी और आत्मनिरीक्षण के रूप में देखा जा रहा है.
जन-सुराज पार्टी की हार: एक गंभीर झटका
जन-सुराज पार्टी ने 2025 बिहार विधानसभा चुनाव में 236 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन वे किसी भी सीट पर विजयी नहीं हो सके। यह पार्टी सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय थी और एक नए राजनीतिक मॉडल के रूप में उभर कर आई थी, जो युवा और रोजगार जैसे विषयों पर केंद्रित थी। इसके बावजूद परिणाम बहुत निराशाजनक रहे, जिसने प्रशांत किशोर को गहरे आत्मविश्लेषण पर मजबूर कर दिया.
नई समयसीमा और शर्तें
प्रशांत किशोर ने अपनी राजनीति छोड़ने की घोषणा से पहले ही एक नई समयसीमा तय कर दी है और शर्तें भी रखी हैं। उनका कहना है कि यदि बिहार में नीतीश कुमार अपनी सरकार के दौरान साल 2025-26 में सभी वादों को पूरा कर देते हैं, तो वह खुद को पूरी तरह से राजनीति से वापस ले लेंगे। इनमें से प्रमुख वादा है – हर गरीब परिवार को दो लाख रुपये की आर्थिक मदद और रोजगार। यदि यह वादे पूरे हो जाते हैं, तो प्रशांत किशोर मानेंगे कि उनका प्रयास सार्थक था और वह अपने वादे अनुसार राजनीतिक संन्यास ले लेंगे।
स्वयं के पुनः गठन का प्रदर्शन
प्रशांत किशोर ने यह भी कहा है कि वह अपने संगठन और अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव ला रहे हैं।
आगामी समय में वह सामाजिक और राजनीतिक बदलाव के नए तरीकों पर काम करेंगे।
अब वह सिर्फ बिहार की जनता के लिए नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए सच्चे बदलाव का सपना दिखाएंगे।
बिहार में नई दिशा
बिहार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार और अन्य नेताओं का साथ होने के बावजूद, प्रशांत किशोर का यह कदम बिहार की राजनीति में नई चर्चा का विषय बन गया है।
वह बिहार की जनता का विश्वास फिर से जीत सके और नए सिरे से बदलाव की शुरुआत कर सके।
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प्रशांत किशोर का यह कदम, जिसमें हार की जिम्मेदारी लेना और मौन व्रत का संकल्प शामिल है,
भारतीय राजनीति में ईमानदारी और आत्मनिरीक्षण की मिसाल पेश करता है।
उनकी नई रणनीति और प्रतिबद्धता यह संकेत देती है कि वे बिहार के लिए बेहतर कल बनाने का प्रयास जारी रखेंगे, भले ही फिलहाल चुनावी पराजय मिली हो। बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में प्रशांत किशोर की यह भूमिका और उनका मिशन आने वाले समय में भी महत्वपूर्ण होगा.
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