ओवैसी की शर्त बिहार: सीमांचल को न्याय मिले तभी नीतीश कुमार को AIMIM का समर्थन
बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय खुलने जा रहा है। अखिल भारतीय मजलिस‑ए‑इत्तेहादुल मुसेल्मीन (AIMIM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कहा है कि वे नीतीश कुमार-नेतृत्व वाली नई सरकार को समर्थन देने को तैयार हैं, लेकिन वहां की राज्य मशीनरी से एक बड़ी माँग उन्होंने रखी है। उनकी शर्त है कि बिहार के उत्तर-पश्चिमी इलाकों में स्थित और लंबे समय से विकास की गहरी खाई में फंसे बलूनी-सेमांचल क्षेत्र को “न्याय और वास्तविक विकास” मिले। उन्होंने कहा कि सिर्फ पटना और राजगीर तक सीमित विकास नहीं चलेगा।

ये है शर्त: सीमांचल को न्याय मिले
ओवैसी ने अमौर विधानसभा क्षेत्र में सभा को संबोधित करते हुए कहा कि:
- बहुत दिनों से सीमांचल, जिसमें पूर्णिया, अररिया, किशनगंज आदि जिले शामिल हैं, उपेक्षित रहा है।
- वहाँ नदी कटाव, बड़े पैमाने पर प्रवासन, भ्रष्टाचार और बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसी चुनौतियाँ आज भी हैं।
- जबकि सरकार का फोकस राजधानी पटना या राजगीर जैसे स्थलों पर अधिक रहा है।
- इसलिए वे पहली शर्त के रूप में कह रहे हैं: “यदि सरकार सीमांचल को वो ध्यान दे, तो हम समर्थन कर सकते हैं।”
यह स्पष्ट है कि ओवैसी का राजनीतिक रणनीति में ऐसा कदम उठाना है जिससे उनके पाँच सीटों वाले AIMIM दल को इलाके में मजबूत आधार मिल सके और सरकार पर भी दबाव बने।
राजनीतिक परिप्रेक्ष्य: क्यों मायने रखती है यह शर्त?
1. एरिया बेस्ड राजनीति
सीमांचल में मुस्लिम-बहुल आबादी है तथा क्षेत्र का पिछड़ापन वर्षों से चर्चा में रहा है।
ओवैसी इस इलाके को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं।
2. समर्थन के बदले विकास की माँग
संवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी समर्थन से पहले AIMIM ने विकास की श्रेणी में शर्त रखी है
– यह सत्ता पक्ष को आगे के लिए जिम्मेदार ठहराता है।
3. नीतीश सरकार के सामने विकल्प
अगर सरकार इस शर्त को स्वीकार करती है, तो पटना-राजगिर के अलावा अन्य इलाकों का ध्यान अधिक जाएगा।
वरना, AIMIM अलग रुख अपनाने का संकेत भी दे रहा है।
क्या मिल सकता है समर्थन, और क्या नहीं?
ओवैसी ने कहा है कि उन्हें “पूरी तरह समर्थन” देने का इरादा है, लेकिन जब तक उस शर्त पर काम नहीं होगा, उन्होंने समर्थन का बड़ा वादा नहीं किया।
इस प्रकार:
- हाँ, समर्थन संभव है यदि निर्धारित शर्तें पूरी हों।
- नहीं, जब तक सरकार दिशा-निर्देश नहीं देती या क्षेत्र का विकास शुरू नहीं होता।
यह स्थिति बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ ला सकती है।
समाज-सुधार या राजनीति?: जनभावना का हिस्सा
ओवैसी की शर्त केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक महत्व की भी है।
सीमांचल जैसे इलाके में जब बुनियादी सुविधाएँ नहीं हों और विकास की गहराई कम हो,
तो यह मुद्दा पुरानी सामाजिक असमानताओं को उजागर करता है।
उनका कहना है कि विकास सिर्फ नाम की योजनाओं से नहीं बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और स्थानीय भागीदारी के साथ होनी चाहिए।
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अगर नीतीश कुमार और उनकी टीम इस शर्त को गंभीरता से लेते हैं,
तो बिहार का एक पिछड़ा-इलाका विकास की मुख्य धारा में आ सकता है।
और अगर शर्त अनदेखी हुई, तो समर्थन की संभावना कमजोर होगी।
यह लेख यह दिखाता है कि राजनीति केवल सीट-संख्या या गठबंधन की बात नहीं रही;
अब विकास-शर्तों और क्षेत्र-वित्तीय न्याय की माँग भी सामने आ रही है।
ओवैसी की शर्त बिहार में इस बार विकास-वितान और राजनीति का नया अध्याय लिख सकती है।
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