One Nation – One Election (ONOE): संसद में जारी संघर्ष
भारतीय सरकार ने फिर से One Nation, One Election (ONOE) की मुहिम को हवा दी है—जिसका मकसद लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनावों को एक साथ आयोजित करना है। मोदी सरकार यह कदम समय और धन की बचत, साथ ही प्रशासनिक थकावट को कम करने वाला बताकर इसे समर्थन दे रही है। लेकिन विपक्ष ने इसे संघीय संरचना, लोकतंत्र, और संविधान में शक्ति संतुलन पर खतरा करार देते हुए तीखी आलोचना की है।

आइए इस विवादित प्रस्ताव के इतिहास, कानूनी ढांचे, राजनीतिक प्रतिक्रियाओं, संस्थागत प्रभावों और आगे की संभावनाओं पर नजर डालते हैं।
1. “One Nation – One Election” का क्या अर्थ है?
“One Nation, One Election” का मतलब है देश में सभी लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक ही समय पर, आमतौर पर हर पाँच साल में, करवाए जाएं। इससे अब तक चल रहे पर्यायवाची चुनावों की बजाय 28 राज्य और 8 केंद्रशासित प्रदेश एक साथ चुनाव कराते।
यह विचार स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में आया था, लेकिन 1967 के बाद इसे छोड़ दिया गया। 2023 की एक उच्च स्तरीय समिति और दिसंबर 2024 में तत्कालीन संसद में पेश किया गया संविधान (129वाँ संशोधन) विधेयक इस प्रस्ताव को कानूनी रूप देने का प्रयास है, हालांकि स्थानीय निकाय चुनाव इसमें शामिल नहीं किए गए हैं।
2. सरकार क्यों समर्थन कर रही है?
बचत और दक्षता
सरकार का कहना है कि ONOE हर लोकसभा चुनाव पर लगभग ₹12,000 करोड़ की बचत करेगा और लगभग 17.5 लाख चुनाव कर्मचारियों की तैनाती से मुक्ति देगा। यह GDP में 1.5% तक का लाभ और मॉडल कोड की कार्रवाई से मुक्ति दिला सकता है।
राष्ट्रवाद की रुह
भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने इसे रामायण के समय से चली आ रही एकता की प्रतीक कहा, और विपक्षी आरोपों को निराधार बताया।
समर्थकों के अनुसार, ONOE सरकार को निरंतर क्रियाशील बनाए रखेगा, राजनीतिक थकान और अराजकता को कम करेगा, और लोकतांत्रिक समन्वय को मजबूत करेगा।
3. विपक्ष के तर्क: लोकतंत्र और संघवाद को खतरा
विरोध में शामिल दल जैसे कांग्रेस, DMK, CPI(M), INDIA ब्लॉक और तमिलनाडु के अन्य नेता अपने चिंतन व्यक्त करते हैं:
संघवाद का खतरा
उन्होंने चेतावनी दी है कि ONOE से राज्यों की स्वायत्तता खतरे में आ सकती है। पंजाब के मंत्री हरपाल चीमा ने कहा कि केंद्र राज्यों की विधानसभा की अवधि बदल सकता है और चुनाव आयोग के निर्णयों का दुरुपयोग कर सकता है।
लोकतांत्रिक जवाबदेही में कमी
कांग्रेस और DMK इसे “लोकतंत्र विरोधी” और केंद्रीकरण की ओर बढ़ता कदम बताते हैं, जो राज्य की आवाज़ को दबा सकता है।
संवैधानिक समस्याएं
विपक्ष का दावा है कि ONOE संविधान की Basic Structure Doctrine का उल्लंघन है, जो शक्ति पृथक्करण और संघीय पहचान को खतरे में डाल सकता है।
तर्कशक्ति की कमी
विपक्ष ने महाराष्ट्र और हरियाणा में गैर-समान समय पर हुए विधानसभा चुनावों का हवाला देते हुए इसकी व्यवहारिकता पर प्रश्न उठाए हैं।
4. विधायी प्रक्रिया: अब तक क्या हुआ
- दिसंबर 2024 में कैबिनेट ने संविधान (129वाँ संशोधन) विधेयक को मंज़ूरी दी।
- शीतकालीन सत्र 2024 में लोकसभा में विधेयक पेश किया गया, जिसके बाद संयुक्त संसदीय समिति (JPC) का गठन हुआ।
- प्रारंभिक चरण में विधेयक को 269 मतों से मंज़ूरी मिली, लेकिन आवश्यक सुपरमेज़ोरिटी नहीं बनी।
5. संस्थागत सवाल और रणनीतिक खेल
चुनाव आयोग – चुनाव की कार्यवाही, मतदाता सूची अद्यतन, और सदस्यविहीन हों तो मध्यावधि चुनाव के संचालन से जुड़े प्रश्न सामने आए हैं।
संवैधानिक न्यायशास्त्र – विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि न्यायिक निरीक्षण के बिना यह प्रस्ताव संविधान संकट की ओर ले जा सकता है।
राज्य सरकारें – उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, केरल और पंजाब ने विरोध जताया है, कहा कि यह संविधान की संघीय स्वायत्तता को कमजोर करेगा।
6. राजनीतिक स्थिति और जनसत्ता
- बीजेपी इसे मोदी सरकार की संस्थागत सुधार और व्यय कटौती की रणनीति का हिस्सा मानती है।
- विपक्ष इसे शक्ति केंद्रीकरण बताते हुए इसे संसद और सड़कों पर रोकने का प्रयास कर रहा है।
- कुछ क्षेत्रीय सहयोगी (जैसे शिवसेना — UBT और BJD) भी सतर्कता की अपील कर रहे हैं।
7. आगे क्या होगा?
- मॉनसून सत्र में संसद में ONOE विधेयक पर जोरदार बहस हो सकती है।
- संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट महत्वपूर्ण समीक्षाएं प्रस्तुत करेगी—संशोधन सुुझाव या निरस्तिकरण हो सकते हैं।
- पूर्ण संवैधानिक संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत और राज्यों की सहमति अनिवार्य होगी—यह आसान नहीं है।
8. क्यों यह आम नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण है
| पहलू | ONOE की दृष्टि | आलोचकों का डर |
|---|---|---|
| प्रशासन | कम व्यवधान, नीति अमल में तेजी | केंद्रीकरण, राज्य स्तर पर नुकसान |
| संविधान | आधुनिक और त्वरित सुधार | मूलभूत संरचना को क्षति पहुँचना |
| मतदाता प्रभाव | समय और पैसा बचत | जवाबदेही में कमी |
| संघवाद | एक एकीकृत राष्ट्रीय आवाज़ | राज्य की पहचान और स्वायत्तता में कमी |
लोकतंत्र का महत्वपूर्ण मोड़
“One Nation, One Election” बहस सिर्फ एक प्रशासनिक योजना नहीं बल्कि भारत के लोकतांत्रिक सिद्धांतों की परीक्षा है। जहां सरकार इसे दक्षता और तालमेल की दिशा में कदम बताती है, वहीं विपक्ष इससे संघवाद और संस्थागत संरचना को हानि पहुँचाने वाली योजना मानता है। जैसे-जैसे संसद इसमें निर्णायक भूमिका निभाएगी, यह तय होगा कि क्या ONOE समकालीन लोकतंत्र सुधार में सहायता बनेगी, या फिर इसकी संभावनाओं पर पश्चिमी लोकतंत्र की तरह ही रोक लग जाएगी।
इसका असर न केवल चुनावी कैलेंडर पर, बल्कि भारत के संविधान की आत्मा पर भी गहरा पड़ेगा।
ये भी पढ़ें: भारत के भीतर शक्तिशाली हिंदू-राष्ट्रवादी आंदोलन
Khaber Box सुझाव:
इस बहस पर करीबी नजर डालिए—यह हर मतदाता और नागरिक के लिए महत्वपूर्ण है। इसे अपने मित्रों के साथ साझा करें और देखें कि कबतक और कैसे ONOE संसद में आगे बढ़ता है।
khaberbox.com पर पढ़ें ताजा समाचार (हिंदी समाचार), मनोरंजन, खेल, क्रिकेट, राजनीति, धर्म, शिक्षा, बाज़ार और प्रौद्योगिकी से जुड़ी हर खबर। समय पर अपडेट या हिंदी ब्रेकिंग न्यूज के लिए खबर बॉक्स चुनें। अपने समाचार अनुभव को और बेहतर बनाएं।

