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मुगल सम्राट जहांगीर और चमड़े के सिक्के: इतिहास का एक अनोखा प्रयोग

मुगल इतिहास के कई रोचक अध्याय हैं, लेकिन एक ऐसा प्रसंग जो बहुत कम लोगों को ज्ञात है — वह है मुगल सम्राट जहांगीर और चमड़े के सिक्के। पारंपरिक रूप से सोना, चांदी और तांबा मुद्रा के रूप में प्रयोग किए जाते थे, लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब चमड़े को आधिकारिक मुद्रा के रूप में अपनाया गया। यह निर्णय उस युग की आर्थिक परिस्थितियों और नवाचार के दृष्टिकोण को उजागर करता है।

सम्राट जहांगीर और चमड़े के सिक्के

मुगल सिक्कों का इतिहास

मुगल साम्राज्य (1526–1857) अपनी कला, स्थापत्य और शासन प्रणाली के लिए प्रसिद्ध था। सोने (मोहुर), चांदी (रुपया) और तांबे के सिक्के उस समय की आर्थिक स्थिरता के प्रतीक थे। इन सिक्कों पर शासक का नाम, उपाधियाँ और धार्मिक वाक्य लिखे होते थे, जो उनकी शक्ति का परिचायक थे।

लेकिन एक समय ऐसा आया जब एक मुगल शासक ने पारंपरिक धातुओं से हटकर एक अनोखा प्रयोग किया — चमड़े के सिक्कों का प्रचलन


चमड़े के सिक्के बनाने वाले सम्राट: जहांगीर

चमड़े के सिक्के बनाने वाले सम्राट थे जहांगीर, जो अकबर महान के पुत्र और मुगल साम्राज्य के चौथे शासक थे (1605–1627 ई.)। जहांगीर अपनी कलात्मक सोच, प्रकृति प्रेम और नवाचार के लिए जाने जाते थे।

इतिहासकारों के अनुसार, यह प्रयोग उस समय हुआ जब धातुओं की कमी थी और आर्थिक संकट गहराता जा रहा था।

चमड़ा सस्ता और आसानी से उपलब्ध होने के कारण, उसे मुद्रा के रूप में अपनाया गया।

इन सिक्कों को कभी-कभी रंग कर असली सिक्कों जैसा बनाया जाता था

और यह विशेष रूप से दक्कन क्षेत्र में चलन में लाए गए।


चमड़े के सिक्कों की आवश्यकता क्यों पड़ी

जहांगीर के शासनकाल में चमड़े के सिक्के चलाने के पीछे कई कारण थे:

  1. सैन्य खर्च: लंबे अभियानों से खजाना खाली हो गया था, और सोने-चांदी की कमी महसूस हुई।
  2. धातु की कमी: आपूर्ति श्रृंखला टूटने और खानों की समस्या से सिक्कों की ढलाई प्रभावित हुई।
  3. स्थानीय स्वीकृति: दूरस्थ इलाकों में चमड़े के सिक्के बनाना और चलाना आसान था, जिससे बाजार में लेन-देन जारी रह सका।

चमड़े के सिक्कों की बनावट और प्रयोग

ये सिक्के आमतौर पर गोल या अंडाकार होते थे, जिन पर सम्राट का नाम और इस्लामी वाक्य उकेरे जाते थे।

इन्हें विशेष रूप से तैयार चमड़े से बनाया जाता था ताकि यह टिकाऊ और हल्के हों।

यूरोपीय यात्रियों ने भले ही इन सिक्कों को कमज़ोर बताया हो, लेकिन ये जहांगीर के आर्थिक नवाचार का अद्भुत उदाहरण थे। इन्होंने व्यापार को स्थिर बनाए रखा और सैनिकों के भुगतान के लिए अस्थायी समाधान प्रदान किया।


ऐतिहासिक महत्व और विरासत

हालाँकि यह प्रयोग अल्पकालिक रहा, परंतु यह मुगल साम्राज्य की व्यावहारिक सोच और जहांगीर की शासन कुशलता को दर्शाता है। आज के नुमिस्मैटिक (सिक्काविद) विशेषज्ञ इन सिक्कों को दुर्लभ ऐतिहासिक धरोहर मानते हैं, जो उस समय की आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति का सटीक चित्र प्रस्तुत करते हैं।

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मुगल सम्राट जहांगीर और चमड़े के सिक्के भारतीय इतिहास का एक अनोखा अध्याय हैं, जहाँ परंपरा और आवश्यकता का संगम हुआ। यह प्रयोग दिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी नवाचार और व्यावहारिक सोच से समस्याओं का समाधान संभव है।

जब भी आप मुगल इतिहास का अध्ययन करें, इस विचित्र लेकिन आकर्षक प्रसंग को अवश्य याद रखें,

जब चमड़ा कुछ समय के लिए सोने-चांदी का विकल्प बना और इतिहास ने नवाचार की एक अनोखी मिसाल दर्ज की।

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