क्या भारतीय राजनीति एक नए युग में प्रवेश कर रही है?
हाल ही में दिल्ली की राजनीति में आए बदलावों का असर पूरे देश पर पड़ा है। लगभग एक दशक तक आम आदमी पार्टी (AAP) ने दिल्ली में शासन किया, और खुद को मुख्यधारा की पार्टियों के विकल्प के रूप में पेश किया। लेकिन केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने दिल्ली सरकार की शक्तियों को सीमित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और दिल्ली सर्विसेज बिल जैसे क़ानूनी बदलावों का सहारा लिया।

अब प्रशासनिक निर्णयों का अधिकार उपराज्यपाल के हाथों में चला गया है, जिन्हें केंद्र नियुक्त करता है।
आलोचकों का कहना है कि यह संघवाद पर हमला है,
जबकि केंद्र इसे राजधानी की सुचारू प्रशासनिक व्यवस्था के लिए जरूरी मानता है।
यह बदलाव न केवल दिल्ली की स्वायत्तता को सीमित करता है,
बल्कि भविष्य में राज्यों और केंद्र के बीच सत्ता के विभाजन को लेकर मिसाल भी बन सकता है।
वक्फ एक्ट विरोध: एक राष्ट्रीय जागरूकता?
इसी दौरान वक्फ अधिनियम के विरोध ने एक अप्रत्याशित लेकिन अहम मोड़ ले लिया है।
शुरुआत में कुछ लोगों ने वक्फ बोर्ड की ज़मीनों के वितरण पर सवाल उठाए,
लेकिन अब यह आंदोलन पारदर्शिता, जवाबदेही और सुधार की राष्ट्रव्यापी मांग बन गया है।
मानवाधिकार संगठनों, पूर्व न्यायाधीशों और कई राज्य नेताओं ने बोर्डों की स्वतंत्र ऑडिट और पुनर्रचना की मांग का समर्थन किया है। यह आंदोलन धर्म विरोधी नहीं, बल्कि निष्पक्षता की मांग है। धार्मिक संस्थानों को भी अब जनता की निगरानी में आना होगा—ठीक वैसे ही जैसे NGO और सार्वजनिक ट्रस्टों से अब जवाबदेही मांगी जाती है।
आम आदमी पार्टी की साख दांव पर
AAP अब कई भ्रष्टाचार के मामलों का सामना कर रही है—यह विडंबना है क्योंकि पार्टी ने खुद को साफ-सुथरी राजनीति का प्रतीक बताया था। शराब नीति घोटाले से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े सौदों में अनियमितताओं तक, CBI और ED ने कई वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ जांच शुरू कर दी है।
AAP इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बता रही है, लेकिन इससे पार्टी की छवि को नुकसान पहुँचा है। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री समेत कई बड़े नेताओं की गिरफ्तारी ने न केवल शासन को प्रभावित किया, बल्कि मतदाताओं के विश्वास को भी चोट पहुंचाई है। पार्टी जो कभी पारदर्शिता की मिसाल थी, अब खुद को नैतिक धरातल पर बचाने में संघर्ष कर रही है।
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शहरी मध्यमवर्ग, जो कभी AAP का मुख्य समर्थन आधार था, अब निराश और संदेहशील होता जा रहा है।
मतदाता अब कठोर सवाल पूछ रहे हैं, वादों की तुलना काम से कर रहे हैं
और स्थानीय चुनावों में क्षेत्रीय दलों या निर्दलीय उम्मीदवारों को तरजीह दे रहे हैं।
मजबूत संघवाद का उदय
हाल की घटनाओं के केंद्र में एक और बड़ा बदलाव है—केंद्र और राज्यों के रिश्ते का नया रूप। राज्य अब भाषा नीति, राजस्व बंटवारा, केंद्रीय एजेंसियों का उपयोग और शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे विषयों पर अपने अधिकारों को लेकर अधिक मुखर हो गए हैं।
तमिलनाडु, केरल और तेलंगाना जैसे दक्षिण भारतीय राज्य लंबे समय से केंद्र के हस्तक्षेप पर आपत्ति जताते रहे हैं।
पश्चिम बंगाल और पंजाब में हालिया राज्यपाल बनाम राज्य सरकार टकराव ने इस संघर्ष को और तीव्र किया है।
वित्तीय संघवाद भी संकट में है। राज्यों का आरोप है कि उन्हें जीएसटी में उनका वाजिब हिस्सा नहीं मिल रहा,
लेकिन उन्हें केंद्रीय योजनाएं फिर भी लागू करनी पड़ती हैं। इससे नए संघीय समझौते की मांग ज़ोर पकड़ रही है।
अब नेता सिर्फ स्थानीय मुद्दों पर नहीं, बल्कि “राज्य अधिकारों की रक्षा” के नाम पर चुनाव लड़ रहे हैं।
यह केंद्र की “एक राष्ट्र, एक नीति” की सोच को चुनौती देने वाली रणनीति है।
जनमत: जागरूक, मुखर और अधीर
भारतीय मतदाता का बदलता चेहरा आज राजनीति में सबसे बड़ा कारक बन गया है। स्मार्टफोन, क्षेत्रीय मीडिया और WhatsApp-YouTube जैसे प्लेटफॉर्म से आज का वोटर पहले से कहीं ज्यादा जागरूक, मुखर और आलोचनात्मक हो गया है।
जहाँ पहले जाति या धर्म वोट दिलाने के लिए पर्याप्त थे, आज की पीढ़ी रोजगार, महंगाई, बुनियादी ढांचे और स्थानीय प्रशासन के आधार पर नेता को आंकती है। राजनीतिक व्यंग्य, फैक्ट-चेकिंग साइट्स और नागरिक पत्रकारिता ने राजनीतिक विमर्श को पारंपरिक मीडिया की पकड़ से बाहर कर दिया है।
इससे नेताओं के लिए चुनाव लड़ना और मुश्किल हो गया है। उन्हें प्रतीकात्मक राजनीति और वास्तविक कार्य के बीच संतुलन बैठाना पड़ रहा है। मतदाता अब सिर्फ वादों से नहीं, साफ-सुथरे और मापने योग्य काम से प्रभावित होता है।
बदलाव का समय
तो क्या भारतीय राजनीति वाकई एक नए युग की ओर बढ़ रही है?—सभी संकेत यही कहते हैं, हालांकि कुछ शर्तों के साथ।
भारत इस समय संक्रमण के दौर में है। पारंपरिक राजनीतिक समीकरण और तौर-तरीके अभी भी मौजूद हैं,
लेकिन उन्हें अब क़ानूनी सक्रियता, क्षेत्रीय शक्ति और नागरिक आंदोलनों से चुनौती मिल रही है।
सत्ता के पुराने केंद्र अब अजेय नहीं, बल्कि सवालों के घेरे में हैं।
हालांकि, राजनीतिक ध्रुवीकरण भी बढ़ रहा है। राष्ट्रीय बहसें अक्सर पहचान आधारित शोरगुल में बदल जाती हैं,
जिससे सार्थक संवाद मुश्किल हो जाता है। फिर भी, जनता के भीतर एक मजबूत इच्छा है,
एक ईमानदार, प्रदर्शन आधारित और गरिमापूर्ण शासन के लिए।
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