भारत के भीतर शक्तिशाली हिंदू-राष्ट्रवादी आंदोलन
दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत आज एक शक्तिशाली वैचारिक आंदोलन — हिंदू-राष्ट्रवाद — के कारण गहराई से बदल रहा है। इस आंदोलन का नेतृत्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) कर रहा है, और भारतीय जनता पार्टी (BJP) इसे राजनीतिक रूप से आगे बढ़ा रही है। यह आंदोलन भारत की दिशा और भविष्य दोनों को आकार दे रहा है।

चलिए जानते हैं इस आंदोलन की जड़ें, विकास, विचारधारा और इसके भारतीय समाज व शासन तंत्र पर प्रभाव।
1. हिंदू राष्ट्रवाद की ऐतिहासिक जड़ें
1925 में डॉ. के.बी. हेडगेवार ने RSS की स्थापना की थी, जिसका उद्देश्य था सभी जातियों और वर्गों के हिंदुओं को एकजुट करना। जहां भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस स्वतंत्रता के लिए समावेशिता को बढ़ावा दे रही थी, वहीं RSS ने चुपचाप हिंदुओं में अनुशासन, देशभक्ति और सांस्कृतिक पहचान की भावना को जागृत किया।
समय के साथ यह संगठन एक विशाल स्वयंसेवक नेटवर्क बन गया, जिसने जमीनी स्तर पर सामाजिक और राजनीतिक सोच को बदल दिया।
2. भाजपा का उदय: हाशिए से सत्ता तक
1980 में गठित BJP लंबे समय तक राजनीतिक रूप से कमजोर रही। 1990 के दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन और 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस ने इसे राष्ट्रीय पटल पर ला दिया।
लेकिन असली बदलाव तब आया जब नरेंद्र मोदी, जो RSS की विचारधारा से प्रशिक्षित थे, आगे आए। उन्होंने विकास, राष्ट्रवाद और हिंदू गौरव को केंद्र में रखा। 2014 और 2019 की भारी जीत के बाद BJP भारत की सबसे प्रभावशाली पार्टी बन गई।
3. मुख्य विचारधारा: हिंदुत्व
हिंदू राष्ट्रवादी आंदोलन का मूल है हिंदुत्व, जिसे 1920 के दशक में वी.डी. सावरकर ने परिभाषित किया था। यह विचारधारा इन बातों को बढ़ावा देती है:
- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
- हिंदू सभ्यता पर गर्व
- विदेशी प्रभावों का विरोध
- जाति और भाषा से ऊपर उठकर हिंदुओं की एकता
यह सोच स्वतंत्रता के बाद के धर्मनिरपेक्ष भारत की परिभाषा को बदलती है।
4. संस्थागत विस्तार
RSS और BJP ने अपने विचारों को विभिन्न संस्थानों में फैलाया है:
- शिक्षा: पाठ्यक्रम में प्राचीन हिंदू योगदानों को शामिल करना
- मीडिया: राष्ट्रवादी टीवी और डिजिटल प्लेटफार्मों का उदय
- न्यायपालिका/नौकरशाही: समान सोच वाले लोगों की नियुक्ति
- धर्म: अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण (2024)
इस तरह की व्यापक उपस्थिति से विचारधारा को देशभर में मजबूती मिलती है।
5. ध्रुवीकरण और आलोचना
आलोचकों का कहना है कि धार्मिक ध्रुवीकरण बढ़ा है:
- अल्पसंख्यकों पर हमले
- विरोध करने वालों को UAPA जैसे कानूनों से चुप कराना
- प्रेस और शिक्षा पर नियंत्रण
- अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा भारत की लोकतांत्रिक रैंकिंग में गिरावट
इसके बावजूद मोदी और BJP की लोकप्रियता, खासकर मध्यवर्ग और श्रमिक वर्ग में, बनी हुई है।
6. जनमानस में अपील
हिंदू राष्ट्रवाद लोगों को इसलिए आकर्षित करता है क्योंकि यह देता है:
- सभ्यता के इतिहास पर गर्व
- करिश्माई नेतृत्व (मोदी की छवि)
- आर्थिक विकास के लिए कल्याणकारी योजनाएँ
- वैश्विक दुनिया में एक सशक्त राष्ट्र पहचान
कई लोगों के लिए यह स्वदेशी गौरव और शक्ति की वापसी का प्रतीक है।
7. वैश्विक प्रभाव
भारत की वैश्विक भूमिका भी इस आंदोलन से प्रभावित हुई है:
- कूटनीति में आत्मविश्वास
- योग, आयुर्वेद और त्योहारों के माध्यम से सॉफ्ट पावर
- प्रवासी भारतीयों के साथ मजबूत संबंध
- QUAD, G20 और BRICS जैसी संस्थाओं में प्रमुख भूमिका
हालांकि, पश्चिमी उदारवादी देश भारत के धर्मनिरपेक्षता में गिरावट पर आलोचना कर रहे हैं।
8. हिंदू राष्ट्रवाद का भविष्य
2029 और आगे के चुनावों को ध्यान में रखते हुए, आंदोलन के कुछ प्रमुख लक्ष्य हैं:
- समान नागरिक संहिता (UCC)
- एक राष्ट्र, एक चुनाव
- संस्थानों में विचारधारा का समावेश
- हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को और मजबूत बनाना
सबसे बड़ा प्रश्न यही है — क्या यह भविष्य सबको साथ ले जाएगा या किसी को पीछे छोड़ देगा?
भारतीय राजनीति पर गहरा प्रभाव
हिंदू-राष्ट्रवादी आंदोलन ने भारत की राजनीति, समाज और वैश्विक भूमिका को पुनर्परिभाषित किया है। यह एक साथ एक लक्ष्य भी है और एक चुनौती भी — हिंदू गौरव को बढ़ाना, लेकिन भारत की विविधता को बनाए रखते हुए।
2025 में RSS के 100 साल पूरे होने पर यह सवाल नहीं है कि आंदोलन भारत को आकार देगा या नहीं — बल्कि यह है कि कितनी दूर तक जाएगा।
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