सरकार कम कर सकती है Customs Duty Slabs: संरचना को सरल और सुव्यवस्थित करने की तैयारी
भारत सरकार एक बार फिर अपने कस्टम्स ड्यूटी ढांचे में सुधार करने की तैयारी कर रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, केंद्र कस्टम्स ड्यूटी स्लैब की संख्या कम कर इसे लगभग पांच से छह स्तरों तक सीमित करने पर विचार कर रहा है।
यह कदम न केवल शुल्क संरचना को सरल बनाएगा बल्कि व्यापार और निवेश को भी सुगम बना सकता है। यह सुधार पिछले बजटों में शुरू किए गए टैरिफ रेशनलाइजेशन की निरंतरता में देखा जा रहा है, जहाँ दरों की जटिलता को कम करने और राष्ट्रीय आर्थिक प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाने पर जोर दिया गया था।

वर्तमान व्यवस्था क्यों जटिल मानी जाती है?
भारत में कस्टम्स ड्यूटी की वर्तमान संरचना कई दशकों में विभिन्न नीतियों और क्षेत्रों की आवश्यकताओं से विकसित हुई है। परिणामस्वरूप:
- कई दरें
- अनेक अपवाद
- विशेष प्रावधान
- एंटी-डंपिंग शुल्क
- सेफगार्ड शुल्क
- काउंटरवेलिंग ड्यूटी
जैसे प्रावधानों ने इसे अत्यधिक जटिल बना दिया है।
इस जटिलता के कारण:
- कंपनियों पर अनुपालन बोझ बढ़ता है
- आयातकों को भ्रम रहता है
- विवाद बढ़ते हैं
- समय और लागत दोनों बढ़ते हैं
विशेषज्ञ मानते हैं कि सरल ढांचा व्यापार वातावरण सुधारने में मदद कर सकता है।
सरकार का उद्देश्य क्या है?
सूत्रों के अनुसार इस सुधार के तीन मुख्य उद्देश्य हैं:
1. Tariff Simplification
कम स्लैब होने से शुल्क संरचना पारदर्शी होगी।
सरलता निवेशकों और उद्योग के लिए महत्वपूर्ण संकेत मानी जाती है।
2. Dispute Reduction
कस्टम्स और मूल्यांकन से जुड़े विवाद सरकार के लिए बड़ी चुनौती हैं।
स्पष्ट दरों से गलतफहमी और मुकदमों में कमी आएगी।
3. National Priorities Alignment
सरकार आयात शुल्क को ऐसे उद्योगों में समायोजित करना चाहती है जो:
- घरेलू विनिर्माण
- टेक्नोलॉजी अपनाने
- रक्षा उत्पादन
- ऊर्जा सुरक्षा
- निर्यात बढ़ाने
जैसे क्षेत्रों को समर्थन दें।
पिछले बजट में क्या सुधार किए गए थे?
पिछले बजट चक्र में सरकार ने:
- कई सैकड़ों टैरिफ लाइनों में संशोधन
- इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर और ऑटो पार्ट्स पर शुल्क संरचना में बदलाव
- रॉ मटीरियल पर शुल्क कम
- फिनिश्ड गुड्स पर शुल्क बढ़ाया
ताकि “Make in India” को बढ़ावा मिले।
अब अगला कदम संरचना का व्यवस्थित सरलीकरण माना जा रहा है।
उद्योग जगत की प्रतिक्रिया
उद्योग जगत में इस कदम का स्वागत किया जा रहा है। विशेष रूप से:
- मैन्युफैक्चरिंग
- लॉजिस्टिक्स
- आयात-निर्यात
- टेक्नोलॉजी
- ई-कॉमर्स
जैसी इंडस्ट्रीज़ को पारदर्शी शुल्क प्रणाली की आवश्यकता है।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों में भी सरल टैरिफ मैपिंग की मांग बढ़ रही है।
भारतीय उपभोक्ताओं पर क्या असर पड़ सकता है?
यह कदम उपभोक्ताओं पर दो तरह से प्रभाव डाल सकता है:
1. कुछ आयात सस्ते हो सकते हैं
खासकर रॉ मटीरियल या टेक्नोलॉजी सेक्टर में।
2. घरेलू उत्पादन को बढ़ावा
लंबे समय में इससे नौकरियां और निवेश बढ़ सकते हैं।
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अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा की दृष्टि से महत्व
कई देशों ने पहले ही सीमित टैरिफ स्लैब अपनाए हैं।
भारत की जटिल संरचना कई बार:
- व्यापारिक वार्ता
- FTA समझौते
- सप्लाई चेन इंटीग्रेशन
में बाधा बनती है।
सरल प्रणाली वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ा सकती है।
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