बुढ़ापा क्यों आता है और मृत्यु क्यों होती है?
हर इंसान के जीवन में कभी न कभी यह सवाल ज़रूर उठता है – बुढ़ापा क्यों आता है और मृत्यु क्यों होती है? जब शरीर कमजोर होने लगता है, बाल सफेद हो जाते हैं, आंखों की रोशनी घटती है और ऊर्जा कम होने लगती है, तब यह प्रश्न और गहरा हो जाता है। और जब किसी अपने की मृत्यु होती है, तब यह सवाल केवल दिमाग में नहीं, दिल में उतर जाता है। यह सवाल केवल डर से नहीं, बल्कि अर्थ की खोज से जुड़ा है।

प्रकृति का नियम: जो जन्मा है, वह बदलेगा
सबसे सरल उत्तर यह है कि बुढ़ापा और मृत्यु प्रकृति के नियम हैं।
प्रकृति में हर चीज़ बदलती है-
- बीज पौधा बनता है
- पौधा पेड़ बनता है
- पेड़ बूढ़ा होकर सूख जाता है
इसी तरह इंसान भी जन्म लेता है, बढ़ता है, परिपक्व होता है और फिर धीरे-धीरे शरीर की शक्ति क्षीण होने लगती है।
बुढ़ापा कोई बीमारी नहीं, बल्कि शरीर का प्राकृतिक परिवर्तन है।
विज्ञान क्या कहता है?
विज्ञान के अनुसार:
- समय के साथ कोशिकाएं (Cells) खुद को ठीक करने की क्षमता खोने लगती हैं
- डीएनए में छोटे-छोटे बदलाव जमा होते जाते हैं
- अंगों की कार्यक्षमता धीरे-धीरे घटती जाती है
इसी प्रक्रिया को हम बुढ़ापा कहते हैं।
मृत्यु तब होती है, जब शरीर की प्रणालियां जीवन को बनाए रखने में असमर्थ हो जाती हैं। यह अचानक भी हो सकती है और धीरे-धीरे भी।
फिर मृत्यु क्यों जरूरी है?
यह सवाल सबसे कठिन है।
अगर मृत्यु न हो, तो—
- दुनिया में जीवन का संतुलन बिगड़ जाएगा
- नए जीवन के लिए जगह नहीं बचेगी
- परिवर्तन रुक जाएगा
मृत्यु प्रकृति का वह द्वार है, जिससे नया जीवन प्रवेश करता है। यह अंत नहीं, बल्कि निरंतरता का हिस्सा है।
दार्शनिक दृष्टि: शरीर नश्वर है, चेतना नहीं
भारतीय दर्शन में कहा गया है-
शरीर नश्वर है, आत्मा नहीं।
अर्थात शरीर एक वस्त्र की तरह है, जिसे चेतना समय के साथ छोड़ देती है।
बुढ़ापा उस वस्त्र के घिसने की प्रक्रिया है और मृत्यु उसे बदलने का क्षण।
इस दृष्टि से देखें, तो मृत्यु कोई दंड नहीं, बल्कि विश्राम है।

बुढ़ापा हमें क्या सिखाता है?
बुढ़ापा केवल कमजोरी नहीं लाता, बल्कि:
- धैर्य सिखाता है
- अहंकार को कम करता है
- जीवन की असली प्राथमिकताएं दिखाता है
- रिश्तों की गहराई समझाता है
युवावस्था में इंसान दौड़ता है, बुढ़ापे में वह ठहरना सीखता है।
मृत्यु का डर क्यों लगता है?
मृत्यु से डर इसलिए लगता है क्योंकि:
- हमें अज्ञात से भय लगता है
- हम अपनों को छोड़ने से डरते हैं
- अधूरे सपनों की चिंता होती है
लेकिन जो व्यक्ति जीवन को पूरी जागरूकता से जीता है, उसके लिए मृत्यु उतनी भयावह नहीं रहती।
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जीवन का अर्थ क्या है, अगर अंत निश्चित है?
यही सबसे सुंदर प्रश्न है।
अगर अंत निश्चित है, तो जीवन का मूल्य और बढ़ जाता है।
- हर दिन महत्वपूर्ण बन जाता है
- हर रिश्ता अनमोल हो जाता है
- हर अनुभव अर्थपूर्ण हो जाता है
बुढ़ापा और मृत्यु हमें यह सिखाते हैं कि जीवन को टालने के लिए नहीं, जीने के लिए मिला है।
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