Avimukteshwaranand Supports Alankar Agnihotri: अविमुक्तेश्वरानंद का बयान बना चर्चा का विषय
देश में प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका अक्सर केवल कानून और व्यवस्था तक सीमित मानी जाती है, लेकिन जब कोई अधिकारी अपने निर्णयों से समाज और संस्कृति से जुड़ा मजबूत संदेश देता है, तो वह चर्चा का विषय बन जाता है। ऐसा ही कुछ देखने को मिला जब ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के समर्थन में खुलकर बयान दिया। उन्होंने कहा, “आखिरकार कोई ऐसा सामने आया है जो वास्तव में हिंदुत्व का सच्चा ‘रत्न’ है।”

Avimukteshwaranand Supports Alankar: क्या है पूरा मामला
Avimukteshwaranand Supports Alankar: बरेली सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री हाल के दिनों में अपने कुछ प्रशासनिक फैसलों और सार्वजनिक रुख के कारण सुर्खियों में आए। इन फैसलों को लेकर समाज के एक वर्ग ने उनकी सराहना की, तो वहीं कुछ लोगों ने सवाल भी उठाए। इसी बीच स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का बयान सामने आया, जिसने इस पूरे मामले को और अधिक राष्ट्रीय स्तर की बहस में ला खड़ा किया।
‘UGC कानून हिंदू समाज के भीतर मतभेद पैदा करेगा’
शंकराचार्य ने उत्तर प्रदेश सरकार की नीतियों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि 2022 से लागू नीतियां और दृष्टिकोण पूरे प्रदेश में ब्राह्मण विरोधी और धर्म विरोधी हैं. उन्होंने विशेष रूप से UGC कानून की आलोचना की और कहा कि यह कानून हिंदू समाज के भीतर मतभेद पैदा करने वाला कानून है. शंकराचार्य ने कहा, “जैसे किसी एक कैंपस में दो छात्र अलग-अलग जातियों से हैं और दोनों हिंदू हैं, लेकिन कानून उन्हें आपस में लड़ाने का कारण बना देता है. इस तरह पूरे हिंदू समाज को आपस में लड़ाकर समाप्त करने की साजिश की गई है. हमें मांग है कि नया UGC कानून तुरंत रद्द किया जाए.”
प्रशासन और आस्था के बीच संतुलन
इस बयान के बाद एक अहम सवाल खड़ा हुआ है—क्या प्रशासनिक अधिकारी आस्था और कानून के बीच संतुलन बना सकते हैं? समर्थकों का मानना है कि अलंकार अग्निहोत्री ने कानून के दायरे में रहकर काम किया और समाज की भावनाओं को भी समझा। वहीं आलोचकों का कहना है कि प्रशासन को किसी भी तरह की धार्मिक पहचान से दूर रहना चाहिए।
सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रिया
अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन के बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई।
कुछ यूजर्स ने इसे साहसिक और सकारात्मक कदम बताया, तो कुछ ने इसे प्रशासन के राजनीतिकरण से जोड़कर देखा।
हालांकि, बड़ी संख्या में लोग ऐसे भी रहे जिन्होंने कहा कि अगर कोई अधिकारी ईमानदारी
और संवेदनशीलता से काम करता है, तो उसकी सराहना होनी चाहिए।
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व्यापक संदेश क्या है
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है
कि प्रशासनिक जिम्मेदारी केवल नियमों के पालन तक सीमित नहीं होती,
बल्कि समाज की नब्ज को समझना भी उतना ही जरूरी है। FOLLOW
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का बयान इसी दिशा में एक संकेत माना जा रहा है
कि सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति संवेदनशीलता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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