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नैना देवी मंदिर नैनीताल: इतिहास, महत्व और प्रसिद्धि

नैना देवी मंदिर नैनीताल झील के उत्तरी किनारे पर स्थित एक अद्भुत और पवित्र स्थान है। यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, शक्ति और इतिहास का जीवंत प्रतीक है। देवी की इस पवित्र पीठ ने न केवल श्रद्धालुओं को आत्मिक शांति दी है, बल्कि यह उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान का एक अहम हिस्सा बन चुकी है।

नैना देवी मंदिर नैनीताल

नैना देवी मंदिर क्यों बनाया गया था?

नैना देवी मंदिर नैनीताल की उत्पत्ति हिंदू धर्म की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कथा से जुड़ी है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव की पत्नी देवी सती, अपने पिता राजा दक्ष के अपमान से व्यथित होकर आत्मदाह कर लेती हैं। शोक में डूबे भगवान शिव सती के शरीर को लेकर पूरे ब्रह्मांड में भटकने लगे।

ब्रह्मांडीय असंतुलन को रोकने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 51 हिस्सों में विभाजित कर दिया। जहां-जहां वे हिस्से गिरे, वहां शक्ति पीठ की स्थापना हुई।

यहां, जहां सती की आंखें (नयना) गिरीं, वहीं यह मंदिर बना — इसलिए इसे “नैना देवी मंदिर” कहा जाता है।

यह स्थल स्त्री शक्ति, करुणा और धैर्य का शाश्वत प्रतीक माना जाता है।


इतिहास और स्थापत्य कला

इतिहासकारों के अनुसार, नैना देवी मंदिर का प्रारंभिक उल्लेख 15वीं शताब्दी में मिलता है, जबकि इसका पहला निर्माण कुषाण काल के दौरान हुआ था। 1880 में आए एक भयानक भूस्खलन में मंदिर नष्ट हो गया, लेकिन श्रद्धालुओं की अटूट आस्था के बल पर इसे 1883 में पुनर्निर्मित किया गया।

वर्तमान मंदिर में पारंपरिक स्थापत्य शैली दिखाई देती है —

  • द्वार पर पत्थर के सिंहों की मूर्तियाँ पहरेदार के रूप में हैं।
  • मंदिर का ढांचा लाल, पीले और सफेद रंगों से सुसज्जित है।
  • गर्भगृह में देवी नैना देवी (आंखों के प्रतीक), भगवान शिव और भगवान हनुमान की प्रतिमाएं स्थापित हैं।
  • एक प्राचीन पीपल का वृक्ष इस मंदिर की पवित्रता को और बढ़ाता है।

नैना देवी मंदिर क्यों प्रसिद्ध है

1. आध्यात्मिक शक्ति का केंद्र

भारत के 51 शक्ति पीठों में से एक होने के कारण, नैना देवी मंदिर नैनीताल श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत पूजनीय है। यहां महिलाएं, दंपत्ति और साधक देवी से शक्ति, सुरक्षा और आशीर्वाद पाने आते हैं।

2. अटूट आस्था और पुनर्निर्माण की गाथा

1880 की त्रासदी के बाद मंदिर का पुनर्निर्माण भक्तों की आस्था का प्रतीक है। स्थानीय मान्यता है कि देवी नैना देवी ने तब से लेकर आज तक नैनीताल शहर को कई प्राकृतिक आपदाओं से बचाया है।

3. प्राकृतिक सौंदर्य और स्थापत्य कला का संगम

मंदिर हिमालय की गोद में बसे नैनी झील के किनारे स्थित है, जहां से पूरे शहर का दृश्य अत्यंत मनमोहक लगता है। यह स्थान एक साथ आध्यात्मिक और प्राकृतिक शांति प्रदान करता है।

4. सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक

मंदिर से एक किलोमीटर के दायरे में मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च भी हैं — जो नैनीताल की धार्मिक एकता और सांस्कृतिक सामंजस्य का प्रतीक हैं।


पूजा और उत्सव

नैना देवी मंदिर नैनीताल में प्रमुख त्योहारों के समय श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है —

  • नवरात्रि,
  • चैत्र मेला,
  • श्राद्ध पर्व आदि के दौरान यहां की रौनक अद्भुत होती है।

वेदिक परंपराओं और स्थानीय लोक-रीतियों के मेल से यहां की पूजा पद्धति अत्यंत भव्य और रंगीन होती है।

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नैना देवी मंदिर नैनीताल न केवल एक पवित्र शक्ति पीठ, बल्कि यह श्रद्धा, इतिहास और धैर्य का प्रतीक भी है।

जहां देवी सती की आंखें गिरी थीं, वहीं आज करोड़ों भक्तों की आस्था जीवित है।

अपनी ऐतिहासिक पुनर्स्थापना, स्थापत्य सौंदर्य और नैनी झील के किनारे की सुंदरता के कारण यह मंदिर उत्तराखंड का धार्मिक रत्न कहलाता है।

हर साल लाखों लोग यहां आकर शक्ति, शांति और आशा की अनुभूति करते हैं।

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