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उत्तराखंड की धराली बाढ़ 2025 त्रासदी: बादल फटा, हिमखंड टूटा या कुछ और?

5 अगस्त 2025 को उत्तरकाशी जिले के शांत हिमालयी गांव धराली में अचानक आई भयंकर बाढ़ ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया। मकान, होटल और सड़कें बह गईं, और दर्जनों लोग लापता या मृत बताए जा रहे हैं। शुरुआत में इसे बादल फटने की घटना माना गया, लेकिन अब विशेषज्ञ इस पर सवाल उठा रहे हैं। कई जानकारों का मानना है कि असली कारण कहीं अधिक जटिल हो सकता है—जैसे कि हिमखंड का टूटना या ग्लेशियर झील का फटना।

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यह लेख धराली बाढ़ 2025 में हुई इस घटना की गहराई से पड़ताल करता है, विशेषज्ञों की राय साझा करता है और बताता है कि हिमालय में पर्यावरण और आपदा प्रबंधन के लिए यह क्या संदेश छोड़ता है।


धराली में क्या हुआ?

5 अगस्त की दोपहर करीब 1:45 बजे, खीर गंगा नदी का जलस्तर अचानक तेज़ी से बढ़ा और कुछ ही मिनटों में बाढ़ ने धराली गांव को अपनी चपेट में ले लिया। इमारतें ढह गईं, गाड़ियाँ नदी में समा गईं और संचार व्यवस्था ठप हो गई।

मीडिया की शुरुआती रिपोर्ट के अनुसार:

  • 4 लोगों की मौत की पुष्टि हुई।
  • 100 से अधिक लोग लापता बताए जा रहे हैं।
  • 20–25 लोगों को बचा लिया गया है।
  • कई होटल, घर और दुकानें क्षतिग्रस्त हो गईं।

पहली सोच: बादल फटना

घटना की खबर आते ही स्थानीय प्रशासन और मीडिया ने इसे Cloud burst (बादल फटना) बताया, जो मानसून के दौरान हिमालयी क्षेत्रों में आम होता है। जब एक घंटे में 100 मिमी से अधिक वर्षा सीमित क्षेत्र में होती है, तो इसे Cloud burst (बादल फटना) कहा जाता है।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने इस क्षेत्र में भारी बारिश की चेतावनी दी थी। इसी वजह से यह मानना स्वाभाविक था कि बाढ़ तेज़ बारिश की वजह से आई।

लेकिन जब विशेषज्ञों ने आंकड़ों की समीक्षा की, तो कई चेतावनी संकेत सामने आने लगे।


विशेषज्ञों की राय: “बादल नहीं फटा”

धराली के नज़दीक स्थित हर्षिल में उस दिन केवल 6.5 मिमी वर्षा दर्ज की गई—जो बादल फटने की परिभाषा से बहुत कम है। पूरे 24 घंटे में कुल वर्षा 11 मिमी से भी कम रही।

इस जानकारी ने Cloud burst (बादल फटना) की थ्योरी को तुरंत खारिज कर दिया।

सवाल ये उठा—अगर बारिश नहीं हुई तो इतनी भीषण बाढ़ कैसे आई?


दूसरा कारण: हिमखंड टूटना या ग्लेशियर झील फटना?

  • हिमखंड टूटना: जब ग्लेशियर का एक बड़ा टुकड़ा टूटकर नीचे गिरता है, तो उसके साथ बर्फ, पानी, मलबा और बर्फ का तूफान नीचे की ओर बहता है।
  • ग्लेशियर झील फटना (GLOF): जब किसी हिम झील को रोकने वाला प्राकृतिक बाँध टूटता है और विशाल मात्रा में पानी नीचे बह जाता है।

उपग्रह तस्वीरों और वैज्ञानिकों के विश्लेषण से पता चला है कि धराली के आसपास ऐसे कई हिमखंड और ऊँचाई पर स्थित झीलें हैं, जो जलवायु परिवर्तन और भूकंपीय हलचलों के कारण अस्थिर हो रही हैं।


पहले भी हुई हैं ऐसी घटनाएँ

उत्तराखंड में इससे पहले भी ग्लेशियर घटनाओं ने भारी तबाही मचाई है:

  • 2021 में चमोली आपदा: एक हिमखंड के टूटने और मलबे के बहाव से 200 से अधिक लोगों की मौत हुई थी।
  • 2013 की केदारनाथ बाढ़: भारी बारिश के साथ ग्लेशियर झील के फटने से आई थी।

ये घटनाएँ दर्शाती हैं कि हिमालयी जलचक्र अब पूर्वानुमान के बाहर जा चुका है।

और जलवायु परिवर्तन इन घटनाओं को और भी तेज़ बना रहा है।


स्थानीय अनुभव: “पहाड़ों से आई सुनामी”

कई लोगों ने कहा कि घटना से पहले बारिश तक नहीं हुई थी—इससे ग्लेशियर थ्योरी को बल मिलता है।

एक होटल मालिक ने कहा: “ना बारिश हुई, ना गरज हुई। बस एक भयानक आवाज़ और फिर सब कुछ बह गया।”

भारतीय सेना, NDRF, SDRF और ITBP द्वारा बचाए गए लोगों ने बताया कि लोग मलबे में दबे थे,

घर ढह रहे थे और पर्यटक मदद की गुहार लगा रहे थे।


राहत और बचाव अभियान

भारतीय सेना मात्र कुछ मिनटों में मौके पर पहुँच गई। NDRF, SDRF और स्थानीय पुलिस ने राहत कार्य शुरू किया।

हेलीकॉप्टर भी भेजे गए, लेकिन मौसम और ऊबड़-खाबड़ इलाक़ा बाधा बना।

हर्षिल में चिकित्सा शिविर लगाए गए और पीड़ितों को वहाँ ले जाया गया।

विस्थापितों के लिए अस्थायी आश्रय और भोजन की व्यवस्था की जा रही है।


सरकार की प्रतिक्रिया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने दुख जताते हुए पूर्ण सहायता का आश्वासन दिया है।

राज्य सरकार ने पीड़ितों के लिए विशेष राहत पैकेज की घोषणा की है और घटना की वैज्ञानिक जांच के आदेश दिए हैं।

मुख्यमंत्री धामी ने केंद्र से अनुरोध किया है कि सभी ग्लेशियर क्षेत्रों की निगरानी के लिए रीयल-टाइम तकनीक लगाई जाए।


जलवायु परिवर्तन: एक मूक शत्रु

विशेषज्ञों के अनुसार, धराली की आपदा जलवायु परिवर्तन का संकेत है, न कि अकेली घटना:

  • हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।
  • हिम झीलें बड़ी और अस्थिर हो रही हैं।
  • भूकंपीय गतिविधियाँ प्राकृतिक बाँधों को अस्थिर बना रही हैं।

UNEP की 2023 रिपोर्ट में उत्तराखंड को ग्लेशियर झील फटने की सबसे ज़्यादा संभावना वाले टॉप 10 क्षेत्रों में रखा गया है।

सवाल ये नहीं है कि अगली आपदा होगी या नहीं, बल्कि ये है कि कब और कहाँ होगी।


प्रमुख सुझाव

  1. 📡 रीयल-टाइम उपग्रह निगरानी – हिम झीलों और बर्फ क्षेत्रों की निरंतर निगरानी।
  2. 🗺️ ग्लेशियर झीलों की मैपिंग – सभी संभावित खतरे वाली झीलों की सूची बनाना।
  3. 🚨 आपदा योजना – स्थानीय प्रशासन के पास मजबूत राहत और संचार योजना हो।
  4. 🏗️ निर्माण नियंत्रण – नदी किनारे निर्माण पर रोक और उच्च जोखिम क्षेत्रों में पर्यटन पर नियंत्रण।
  5. 📣 जन-जागरूकता – स्थानीय लोगों और पर्यटकों को चेतावनी संकेतों की जानकारी देना।

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