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महार्षि दयानंद सरस्वती स्मारक सिक्का: आर्य समाज के 150 वर्ष और समाज सुधार की विरासत का सम्मान

भारत सरकार ने एक ऐतिहासिक पहल के तहत महार्षि दयानंद सरस्वती स्मारक सिक्का जारी किया है, जो उनके 200वें जन्म वर्ष और आर्य समाज की 150वीं वर्षगांठ को समर्पित है।

महार्षि दयानंद सरस्वती स्मारक सिक्का

यह कदम न केवल भारत के महान समाज सुधारक को श्रद्धांजलि है, बल्कि आर्य समाज के उस अमूल्य योगदान का भी प्रतीक है, जिसने पिछले 150 वर्षों में भारत की संस्कृति, शिक्षा और सामाजिक चेतना को नई दिशा दी है।


महार्षि दयानंद सरस्वती: समाज सुधार के अग्रदूत

  • महार्षि दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी 1824 को टंकारा, गुजरात में हुआ था।
  • उन्होंने 1875 में आर्य समाज की स्थापना की, जिसका उद्देश्य था —
  • भारत को सामाजिक बुराइयों, अंधविश्वास और जातिगत भेदभाव से मुक्त कराना।

उनका प्रसिद्ध नारा “वेदों की ओर लौटो” (Back to the Vedas) एक ऐसी विचारधारा बना जिसने समाज में तर्क, शिक्षा और समानता का संचार किया।
बाल विवाह, सती प्रथा और अस्पृश्यता जैसी प्रथाओं के विरोध में उनकी आवाज़ ने समाज में एक नई चेतना जगाई।

महार्षि दयानंद ने “स्वराज्य” का विचार सबसे पहले दिया — जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम की वैचारिक नींव रखी।


आर्य समाज के 150 वर्ष: सेवा, शिक्षा और सत्य का संदेश

  • 1875 में स्थापित आर्य समाज ने शिक्षा, सामाजिक सुधार और मानव सेवा के क्षेत्र में अमिट छाप छोड़ी है।
  • इस संस्था ने समाज में वैज्ञानिक सोच, महिला शिक्षा और समान अधिकारों को बढ़ावा दिया।

महार्षि दयानंद की सोच से प्रेरित होकर DAV स्कूल्स और कॉलेजेस जैसी संस्थाओं की स्थापना हुई — जो आज भी सत्य, शिक्षा और संस्कारों पर आधारित शिक्षा प्रदान करती हैं।

  • आर्य समाज सदैव सत्य, करुणा और समानता के मूल्यों पर कार्य करता रहा है।
  • 150 वर्षों की इस यात्रा ने भारत को सामाजिक जागरूकता और नैतिकता की दिशा में आगे बढ़ाया है।

स्मारक सिक्कों का विमोचन और राष्ट्रीय आयोजन

नई दिल्ली में आयोजित इंटरनेशनल आर्यन समिट 2025 में इन दोनों अवसरों को भव्य रूप से मनाया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समारोह में कहा —

“महार्षि दयानंद सरस्वती वह प्रकाश हैं, जिनकी शिक्षाएँ आज भी करोड़ों भारतीयों में आशा और आत्मविश्वास जगाती हैं।”

इस मौके पर जारी ₹200 का विशेष सिक्का महार्षि के आदर्शों, शिक्षाओं और उनके “वेद ज्ञान” के प्रतीक चिन्हों से सुसज्जित है।
इसके साथ ही आर्य समाज की 150वीं वर्षगांठ के लिए स्मारक सिक्का भी जारी किया गया, जो समाज के नैतिक और शैक्षणिक योगदान को सम्मानित करता है।

इन कार्यक्रमों में प्रदर्शनियां, सांस्कृतिक आयोजन और विचार गोष्ठियाँ भी आयोजित की गईं — जिन्होंने दिखाया कि महार्षि के सिद्धांत आज भी आधुनिक भारत की आत्मा में जीवित हैं।

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स्थायी प्रेरणा और राष्ट्रीय गौरव

महार्षि दयानंद सरस्वती स्मारक सिक्का केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि भारत की उस स्थायी परंपरा का सम्मान है

— जो सत्य, समानता और ज्ञान पर आधारित है।

इन सिक्कों का विमोचन हमें यह याद दिलाता है कि
महार्षि दयानंद और आर्य समाज का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना 150 वर्ष पहले था।

यह पहल समाज में तर्क, न्याय और आत्मनिर्भरता की भावना को जीवित रखती है

— और यह सुनिश्चित करती है कि भारत आने वाले समय में भी इन आदर्शों पर अग्रसर रहे।

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