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कर्नाटक में बिना अनुमति के सड़कों और सरकारी संपत्ति पर नमाज पर प्रतिबंध की मांग ने बढ़ाई राजनीतिक हलचल

पूर्व बीजेपी विधायक बसनगौड़ा पाटिल यतनाल ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को पत्र लिखकर कर्नाटक में नमाज पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। उनका कहना है कि बिना अनुमति सरकारी संपत्तियों, सड़कों और फुटपाथों पर नमाज पढ़ने से जनता को असुविधा होती है और यातायात बाधित होता है।

कर्नाटक में नमाज पर प्रतिबंध

यह पत्र ऐसे समय में आया है जब राज्य सरकार सार्वजनिक स्थानों पर धार्मिक या अन्य आयोजनों को नियंत्रित करने के लिए नए नियम लागू करने जा रही है।


यतनाल की मांग के पीछे कारण क्या हैं?

बसनगौड़ा पाटिल यतनाल की अपील कर्नाटक सरकार की उस घोषणा के बाद आई है

जिसमें सरकार ने कहा था कि सार्वजनिक संपत्तियों का उपयोग किसी भी आयोजन के लिए बिना अनुमति नहीं किया जा सकेगा। माना जा रहा है कि यह कदम आरएसएस जैसी संस्थाओं के मार्च पर रोक से जुड़ा है। यतनाल ने तर्क दिया कि अगर सरकार एक संगठन के लिए ऐसा नियम बना रही है तो वही नियम सब पर लागू होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि सड़कों और सरकारी संपत्तियों पर नमाज पढ़ना वाहनों और पैदल चलने वालों के लिए असुविधाजनक है

और यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 19 और 21) का उल्लंघन करता है।


यतनाल की मांगें क्या हैं?

अपने पत्र में यतनाल ने मुख्यमंत्री से यह तीन प्रमुख मांगें रखीं:

  1. राज्य के सभी उपायुक्तों और पुलिस आयुक्तों को निर्देश जारी करें कि बिना अनुमति किसी भी सार्वजनिक स्थान या सरकारी संपत्ति पर नमाज न पढ़ी जाए।
  2. कर्नाटक पुलिस अधिनियम के तहत एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाई जाए जिससे ऐसी धार्मिक गतिविधियों की निगरानी और कार्रवाई संभव हो सके।
  3. समान नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाए ताकि सभी धर्मों और संगठनों के साथ समान व्यवहार हो और प्रशासनिक विश्वसनीयता बनी रहे।

उन्होंने कहा कि अगर सार्वजनिक स्थानों पर आरएसएस जैसे आयोजनों पर रोक लगाई जा रही है,

तो नमाज या अन्य धार्मिक आयोजनों पर भी लागू होनी चाहिए ताकि चयनात्मक कार्रवाई की भावना न बने।


सरकार और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने स्पष्ट किया कि यह नीति किसी विशेष समुदाय या संगठन के खिलाफ नहीं है।

राज्य सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक स्थानों का दुरुपयोग न हो।

यह नीति 2013 की बीजेपी सरकार की उस परिपत्र जैसी ही है,

जिसमें स्कूल परिसरों का उपयोग गैर-शैक्षणिक गतिविधियों के लिए प्रतिबंधित किया गया था।

सरकार ने कहा कि सभी धार्मिक और गैर-धार्मिक समूहों को सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए लिखित अनुमति लेना अनिवार्य होगा, और उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई होगी।

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इस नीति को लागू करते समय धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।


जनता और राजनीतिक प्रतिक्रिया

यतनाल की मांग ने राज्य में राजनीतिक बहस छेड़ दी है।

कुछ लोग इसे तटस्थता और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की दिशा में आवश्यक कदम मान रहे हैं।

प्रशासन को धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए ऐसी नीतियों को संवेदनशील ढंग से लागू करना चाहिए।


कर्नाटक में नमाज पर प्रतिबंध की बहस

यतनाल के पत्र ने यह बड़ा प्रश्न खड़ा किया है कि लोकतांत्रिक और बहुधार्मिक राज्य में धार्मिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक नियंत्रण का सही संतुलन कैसे रखा जाए। सरकार सार्वजनिक स्थानों पर नियंत्रण बनाए रखते हुए सभी समुदायों के अधिकारों की रक्षा करे। कर्नाटक में नमाज पर प्रतिबंध का यह मुद्दा केवल एक धार्मिक प्रश्न नहीं, बल्कि समानता, संविधानिक अधिकार और धर्मनिरपेक्षता की परीक्षा भी है।

Disclaimer: यह लेख एक सामाजिक पोस्ट या अनुसंधान पर आधारित है। खबरबॉक्स इन तथ्यों की पुष्टि नहीं करता है।

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