साड़ी से पहले महिलाएं क्या पहनती थीं? जानिए भारत के परिधान का भूला-बिसरा इतिहास
हर साल 21 दिसंबर को World Saree Day मनाया जाता है। साड़ी आज भारतीय महिलाओं की पहचान, गरिमा और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बन चुकी है। यह एक ऐसा परिधान है जो बिना सिलाई के होते हुए भी सौंदर्य, परंपरा और आधुनिकता – तीनों को समेटे हुए है। लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि साड़ी के अस्तित्व में आने से पहले महिलाएं क्या पहनती थीं? यह सवाल जितना सरल लगता है, इसका जवाब उतना ही रोचक और गहराई से जुड़ा हुआ है भारत के प्राचीन इतिहास से।

साड़ी की जड़ें कहां से शुरू होती हैं?
इतिहासकारों के अनुसार साड़ी जैसी पोशाक का सबसे पुराना प्रमाण Indus Valley Civilization से मिलता है, जो लगभग 2800 से 1800 ईसा पूर्व की मानी जाती है।
मोहनजोदड़ो और हड़प्पा से मिली मूर्तियों और मुहरों में महिलाओं को कपड़े को शरीर के चारों ओर लपेटे हुए दिखाया गया है।
हालांकि, उस समय की पोशाक आज की साड़ी जैसी पूरी तरह विकसित नहीं थी।
साड़ी से पहले का दौर: महिलाएं क्या पहनती थीं?
1. अंतरीय (Antariya) – कमर से नीचे का वस्त्र
प्राचीन भारत में महिलाओं द्वारा पहना जाने वाला मुख्य वस्त्र अंतरीय था।
यह एक बिना सिला हुआ कपड़ा होता था, जिसे कमर के चारों ओर लपेटा जाता था—कुछ हद तक आज की धोती या लहंगे जैसा।
2. उत्तरीय (Uttariya) – ऊपरी आवरण
अंतरीय के साथ महिलाएं उत्तरीय पहनती थीं, जो एक लंबा कपड़ा होता था।
इसे कंधों पर डाला जाता था या सिर को ढकने के लिए उपयोग किया जाता था।
3. स्तनपट्ट (Stanapatta) – छाती को ढकने का वस्त्र
कुछ क्षेत्रों में महिलाएं छाती को ढकने के लिए स्तनपट्ट पहनती थीं।
यह आज के ब्लाउज का प्रारंभिक रूप माना जा सकता है।
इन तीनों वस्त्रों को मिलाकर देखा जाए, तो यही व्यवस्था आगे चलकर साड़ी के रूप में विकसित हुई।
वैदिक और उत्तर वैदिक काल में परिधान
वैदिक काल में कपड़े आमतौर पर:
- सूती या ऊनी होते थे
- बिना सिलाई के होते थे
- मौसम और क्षेत्र के अनुसार पहने जाते थे
महिलाओं की पोशाक में सादगी और सुविधा सबसे अहम थी। उस दौर में शरीर को ढकना शालीनता और धार्मिक भावना से जुड़ा माना जाता था, न कि फैशन से।
साड़ी का क्रमिक विकास कैसे हुआ?
समय के साथ:
- अंतरीय और उत्तरीय का संयोजन एक ही लंबे वस्त्र में बदल गया
- ब्लाउज और पेटीकोट जैसे सिले हुए वस्त्र बाद में जुड़े
- क्षेत्रीय संस्कृतियों के अनुसार पहनने की अलग-अलग शैलियां बनीं
इसी क्रमिक विकास से साड़ी वह रूप ले पाई, जिसे हम आज जानते हैं।
भारत के बाहर भी साड़ी जैसी पोशाक
साड़ी सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रही।
आज भी महिलाएं:
- Pakistan
- Bangladesh
- Sri Lanka
जैसे देशों में साड़ी या उससे मिलती-जुलती पोशाक पहनती हैं। यह दर्शाता है कि यह परिधान पूरे दक्षिण एशिया की साझा सांस्कृतिक विरासत है।
World Saree Day का महत्व
World Saree Day सिर्फ एक परिधान का उत्सव नहीं है, बल्कि:
- महिलाओं की ऐतिहासिक यात्रा का सम्मान
- भारतीय हस्तकला और बुनकरों की पहचान
- परंपरा और आधुनिकता के संगम का उत्सव
है।
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99% लोग क्यों नहीं जानते यह इतिहास?
क्योंकि हम अक्सर साड़ी को जैसा आज है, वैसा ही हमेशा से मान लेते हैं।
हम यह भूल जाते हैं कि हर परंपरा – चाहे वह परिधान हो या संस्कृति – विकास की लंबी यात्रा से गुजरकर यहां तक पहुंचती है।
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