ये केसी शान: भारत में ट्रैफिक नियम का उल्लंघन, 80,000 वाहनों का पांच बार से अधिक बार चालान
भारत में सड़क अनुशासन और जिम्मेदारी पर सवाल उठाने वाला एक चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। देश में लगभग 80,000 वाहन ऐसे हैं जिन्हें पांच या उससे अधिक बार चालान किया गया है, लेकिन फिर भी वही चालक बार-बार ट्रैफिक नियम तोड़ते हैं। आखिर यह कैसी शान है?

कई बार जुर्माना भरने के बाद भी ड्राइवरों को कोई शर्म नहीं होती, जिससे पहले से भरी सड़कों पर और खतरा बढ़ता है। प्रशासन अब एआई कैमरा और ई-चालान सिस्टम के जरिए सख्ती बढ़ा रहा है, लेकिन दोहराए जाने वाले भारत में ट्रैफिक नियम उल्लंघन अब भी जारी हैं।
बार-बार नियम तोड़ना बना आम बात
हाल ही में कई राज्य परिवहन विभागों के आंकड़ों से पता चला है कि बार-बार अपराध करने वाले चालक, स्पीडिंग, रेड लाइट तोड़ना या बिना हेलमेट चलना जैसे अपराधों के लिए चालान भरने के बाद भी सुधर नहीं रहे हैं।
दिल्ली, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में लगभग 11% चालक साल में दस से अधिक बार ट्रैफिक नियम तोड़ते हैं।
सिर्फ बेंगलुरु में ही इस साल 15 लाख से अधिक ट्रैफिक जांचों में पाया गया कि लगभग 60% चालकों पर कम से कम एक लंबित चालान है और हजारों पर पांच या अधिक जुर्माने बाकी हैं। कई लोगों ने जुर्माने को “रूटीन खर्च” मान लिया है, बिना यह समझे कि वे दूसरों की जान जोखिम में डाल रहे हैं।
न खत्म होने वाला उल्लंघन चक्र
एआई-आधारित कैमरे और FASTag से जुड़े चालान सिस्टम के बावजूद, बहुत कम लोग नियमों का पालन करते हैं। भारत में करीब 75% ट्रैफिक जुर्माने अभी भी बकाया हैं, जिससे हर साल हजारों करोड़ रुपये का नुकसान होता है।
यह स्थिति सिर्फ कानून में खामियों को नहीं दिखाती, बल्कि यह एक गहरी सामाजिक सोच की समस्या भी उजागर करती है — लोग उन नियमों का सम्मान नहीं करते जो जीवन की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं।
ओवरस्पीडिंग, गलत दिशा में ड्राइविंग और लापरवाह ओवरटेकिंग जैसी गलतियाँ आम हो गई हैं।
डिजिटल निगरानी ने उल्लंघन पकड़ने की दर तो बढ़ाई है, लेकिन जवाबदेही नहीं।
सड़क हादसों का असली असर
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष भारत में 4.8 लाख सड़क हादसे हुए जिनमें 1.72 लाख लोगों की मौत हुई।
इनमें से लगभग 70% मौतें तेज रफ्तार और ध्यान न देने के कारण हुईं।
केवल जुर्माने से नहीं, बल्कि ड्राइविंग लाइसेंस पॉइंट, बीमा और कानूनी दायित्व से जुड़ी सख्त सजा व्यवस्था जरूरी है।
कुछ पश्चिमी देशों में लगातार ट्रैफिक उल्लंघन करने वालों के वाहनों का रजिस्ट्रेशन नवीनीकरण रोक दिया जाता है
या उन्हें सामुदायिक सेवा और सड़क सुरक्षा पाठ्यक्रम पूरे करने पड़ते हैं।
भारत में ऐसे कदम अब भी दुर्लभ हैं।
चालान क्यों काम नहीं कर रहे?
कई विशेषज्ञों का कहना है कि जुर्माने से सुधार नहीं होता, क्योंकि कुछ वर्गों के लिए यह केवल “अफोर्डेबल पेनल्टी” है।
लाइसेंस सस्पेंड करने या वाहनों को जब्त करने जैसी कार्रवाइयों की कमी, और ट्रैफिक विभागों में भ्रष्टाचार और थकान ने हालात बिगाड़ दिए हैं।
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दिल्ली और हैदराबाद जैसे कुछ शहर अब ऐसे एकीकृत सिस्टम की ओर बढ़ रहे हैं,
जो फिटनेस चेक, बीमा नवीनीकरण और चालान को जोड़ता है — ताकि अपराधियों को सिस्टम से बाहर रखा जा सके।
बदलाव की जरूरत
असल समस्या सोच की है। ट्रैफिक नियम केवल दिखावे के लिए नहीं हैं — यह समाज का सुरक्षा अनुबंध हैं।
सरकार द्वारा डिजिटल निगरानी का कदम सराहनीय है, लेकिन सामान्य समझ ही असली समाधान है।
ड्राइवरों को समझना चाहिए कि नियम लागू करना परेशान करना नहीं, बल्कि सुरक्षा देना है।
भारत में ट्रैफिक नियम उल्लंघन कोई गर्व की बात नहीं बल्कि एक चेतावनी है।
जब तक समाज सड़क सुरक्षा को अपने अहंकार से ऊपर नहीं रखेगा, तब तक यह लापरवाह प्रवृत्ति खत्म नहीं होगी।
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