एक प्रगतिशील पीढ़ी, एक महत्वपूर्ण चुनाव – बचाई जा सकने वाली जिंदगियों को खोने का दर्द
एक बच्चे की मृत्यु हमेशा एक त्रासदी होती है। लेकिन जब कोई बच्चा उस बीमारी से मर जाए जिसे हम रोक सकते हैं, तो यह त्रासदी कहीं अधिक गहरी हो जाती है। सालों तक दुनिया भर में बच्चों की जान बचाने की दिशा में निरंतर प्रगति होती रही। लेकिन अब परिस्थितियाँ बदलने लगी हैं – और यह प्रगति उलटी दिशा में जाने लगी है।

जिंदगियों को खोने का दर्द: 2024 में, 4.6 मिलियन बच्चों ने अपना पांचवां जन्मदिन देखने से पहले ही दम तोड़ दिया।
2025 में यह संख्या बढ़कर 4.8 मिलियन होने का अनुमान है-
यानी इस सदी में पहली बार बच्चों की मौतों में बढ़ोतरी दर्ज होगी।
यह बढ़ोतरी सिर्फ एक संख्या नहीं है, यह उन आवाज़ों का मौन हो जाना है जो कभी दुनिया को हँसी से भर सकती थीं।
यह 5,000 से अधिक कक्षाओं के बच्चों के बराबर है – वे बच्चे जो कभी अपना नाम लिखना या अपने जूते के फीते बाँधना भी नहीं सीख पाए।
लेकिन यह कहानी ऐसे समाप्त नहीं होनी चाहिए। और न ही इसका भविष्य तय हो चुका है।
क्यों बढ़ रही हैं रोकी जा सकने वाली बीमारियों से मौतें?
आज दुनिया जिन चुनौतियों का सामना कर रही है, वे बच्चों की स्वास्थ्य सुरक्षा पर सीधा असर डाल रही हैं।
- स्वास्थ्य सेवाओं में असमानता
- टीकाकरण कार्यक्रमों में रुकावट
- बढ़ती गरीबी
- जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न बीमारियाँ
- संघर्ष और विस्थापन
ये सभी कारण उस प्रगति को रोक रहे हैं, जो हमने दशकों के प्रयास के बाद हासिल की थी।
2024 तक दुनिया ने मलेरिया, निमोनिया, डायरिया, कुपोषण जैसी असंख्य बीमारियों से लड़ाई में अद्भुत सफलता पाई थी।
लेकिन अब चुनौतियाँ इतनी जटिल हो गई हैं, कि उनकी वजह से रोकी जा सकने वाली मौतें बढ़ रही हैं।
यह हमारे सामने खड़ा सबसे कठिन प्रश्न है
क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को वही संरक्षण दे पाएंगे जो उन्हें मिलना चाहिए?
यह प्रश्न सिर्फ सरकारों का नहीं, समाज, संगठनों, विशेषज्ञों और हर जिम्मेदार नागरिक का भी है।
अगला अध्याय दो तरीकों में लिखा जा सकता है
मेरी दृष्टि में आने वाला भविष्य दो अलग दिशाओं में जा सकता है।
पहला रास्ता: हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें
यदि दुनिया मौजूदा स्थिति को ऐसे ही चलने दे-
- स्वास्थ्य सेवाएँ पिछड़ती जाएँगी
- टीकाकरण कवरेज घटेगा
- गरीब देशों के बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे
- हर साल लाखों जानें ऐसे ही जाती रहेंगी
यह वह रास्ता है जहाँ निराशा, उपेक्षा और असमानता बढ़ती है।
दूसरा रास्ता: हम मिलकर बदलाव का निर्णय लें
यह रास्ता उम्मीद का है, कार्रवाई का है और जिम्मेदारी का है।
यदि दुनिया-
- बीमारियों की रोकथाम को प्राथमिकता दे
- टीकाकरण कार्यक्रमों को सुदृढ़ करे
- हर क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाए
- वैश्विक सहयोग को गहरा करे
- शोध व नवाचार को तेज करे
तो आने वाले वर्षों में लाखों बच्चों की जिंदगी बचाई जा सकती है।
यह वही रास्ता है जिससे प्रगति लौट सकती है – बल्कि और भी मजबूत होकर।
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हमारा चुनाव तय करेगा आने वाले बच्चों का भविष्य
आज हम जिस मोड़ पर खड़े हैं,
वह केवल आंकड़ों का संकट नहीं है – यह मानवता की परीक्षा है।
क्या हम उस दुनिया का निर्माण करेंगे जहाँ कोई भी बच्चा सिर्फ़ इसलिए न मरे कि वह गरीब है, दूर-दराज में रहता है या उसके पास बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएँ नहीं हैं?
यह निर्णय हमारा है। एक पूरी पीढ़ी की प्रगति हमारी एकजुट कार्रवाई पर निर्भर है।
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