मेरठ में डिमोलिशन ड्राइव: क्या मेरठ में 600 इमारतें गिराई जाएँगी? माधवपुरम, जागृति विहार और शास्त्री नगर इस सूची में। व्यापारी आर-पार के मूड।
मेरठ में डिमोलिशन ड्राइव की खबर फैलते ही शहर में तनाव का माहौल है। बताया जा रहा है कि लगभग 600 इमारतें, जिनमें माधवपुरम, जागृति विहार और शास्त्री नगर के व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स शामिल हैं, गिराई जा सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट के अवैध निर्माणों को तोड़ने के आदेश ने स्थानीय व्यापारियों में गहरी चिंता और गुस्सा पैदा कर दिया है। व्यापारी अब “करो या मरो” के मूड में हैं और अपने व्यवसाय बचाने के लिए हर कदम उठाने को तैयार हैं।

क्या है मेरठ में डिमोलिशन ड्राइव का मामला?
मेरठ हाउसिंग एंड डेवलपमेंट बोर्ड ने अदालत के आदेशों का पालन करते हुए आवासीय भूमि पर बने अवैध व्यावसायिक निर्माणों पर कार्रवाई शुरू की। संकट की शुरुआत शास्त्री नगर से हुई, जहां सेंट्रल मार्केट में 22 दुकानों वाले एक कॉम्प्लेक्स को तोड़ा गया।
यह कार्रवाई पुलिस और प्रशासन की मौजूदगी में की गई और यह केवल शुरुआत है।
सूत्रों के मुताबिक, 31 प्लॉट्स पर 90 दुकानों को नोटिस जारी किए जा चुके हैं और करीब 600 इमारतें जांच के दायरे में हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कई इमारतें जोनिंग नियमों का उल्लंघन करते हुए आवासीय जमीन पर व्यावसायिक उपयोग के लिए बनाई गई थीं।
व्यापारियों की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी गई, और अब सख्ती से कोर्ट के आदेश लागू हो रहे हैं।
व्यापारी परेशान, सड़कों पर विरोध
मेरठ के बाजारों का माहौल बेहद तनावपूर्ण है। दुकानदारों ने अपने प्रतिष्ठान बंद कर दिए हैं,
विरोध मार्च निकाले जा रहे हैं और काली पट्टियाँ बांधकर प्रदर्शन किए जा रहे हैं।
सेंट्रल मार्केट, जागृति विहार और माधवपुरम में लोग अपनी रोज़ी-रोटी की चिंता में हैं।
ये दुकानें वर्षों से सैकड़ों परिवारों का सहारा रही हैं और अब इन्हें गिराना अन्याय है।
वे स्थानीय नेताओं और जनप्रतिनिधियों से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं।
व्यापारी संघों ने चेतावनी दी है कि अगर डिमोलिशन ड्राइव नहीं रुकी, तो अनिश्चितकालीन हड़ताल की जाएगी।
कई इमारतें ईमानदारी से खरीदी गई थीं और पुरानी कानूनी उलझनों की सज़ा आम लोगों को नहीं मिलनी चाहिए।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और स्थानीय विधायकों से राहत की गुहार भी नाकाम रही है।
प्रशासन का रुख
प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई मनमानी नहीं है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेशों के तहत हो रही है। सरकार का तर्क है कि अवैध निर्माणों पर सख्ती से रोक लगाना शहर की योजना व्यवस्था को बनाए रखने के लिए जरूरी है।
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अधिकारी बता रहे हैं कि जिन दुकानों को नोटिस दिया गया था, उन्हें समय पर खाली करने का अवसर मिला, लेकिन कई व्यापारी अंतिम समय में राहत की उम्मीद में वहीं डटे हुए हैं। कुछ अधिकारियों ने आर्थिक सहायता या कानूनी मदद की पेशकश की है, लेकिन अधिकांश व्यापारियों के लिए यह उनके भविष्य पर सीधा खतरा है।
अब आगे क्या?
मेरठ इस समय एक निर्णायक मोड़ पर है। स्थानीय लोग चाहते हैं कि सरकार माफी योजना या पुनर्वास पैकेज पर विचार करे, जबकि अदालतें नियमों के पालन पर अड़ी हैं। आने वाले दिनों में प्रदर्शन, मुकदमे और शहरव्यापी बंद जैसी स्थिति बन सकती है। यह लड़ाई केवल जमीन की नहीं है, बल्कि विश्वास, रोज़गार और एक बदलते शहर में कानून और इंसानियत के बीच संतुलन की भी है।
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