इंसानों को खाते है दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम देश के आदिवासी लोग – इंडोनेशिया की जनजातियाँ
इंडोनेशिया के पापुआ क्षेत्र के घने जंगलों में एक ऐसी जनजातीय दुनिया मौजूद है जो आधुनिक सभ्यता से लगभग पूरी तरह अछूती है। इंडोनेशिया की जनजातियाँ न केवल अपनी अलग जीवनशैली के लिए जानी जाती हैं, बल्कि उनकी परंपराएँ और आस्था आज भी दुनिया को हैरान करती हैं।

दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश होने के बावजूद, इंडोनेशिया के इस हिस्से में कुछ ऐसी आदिवासी जनजातियाँ हैं जो अब भी पारंपरिक और आध्यात्मिक जीवन जीती हैं। मानवशास्त्रीय अध्ययनों के अनुसार, पापुआ और वेस्ट पापुआ की कुछ जनजातियाँ कभी प्राचीन धार्मिक या सामाजिक रस्मों के तहत मानव मांसाहार जैसी प्रथाएँ अपनाती थीं।
पापुआ – विविधता और रहस्य की भूमि
इंडोनेशिया अपने सुंदर द्वीपों, इस्लामी संस्कृति और विविध परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन पापुआ की धरती बिल्कुल अलग है। देश के पूर्वी छोर पर स्थित यह क्षेत्र सैकड़ों मूल जनजातियों का घर है, जो सदियों से जंगलों और पहाड़ी इलाकों में रहते आए हैं। इन जनजातियों ने बाहरी दुनिया से बहुत कम संपर्क रखा है, जिससे उनकी हजारों साल पुरानी परंपराएँ आज भी जीवित हैं।
जहाँ जावा और सुमात्रा जैसे द्वीप आधुनिक इस्लामी जीवनशैली और विकास से भर चुके हैं,
वहीं पापुआ की जनजातियाँ अब भी प्रकृति की पूजा करती हैं और आत्मा-आधारित विश्वासों का पालन करती हैं।
मानवशास्त्रियों का कहना है कि कुछ जनजातियाँ पहले धार्मिक या न्यायिक कारणों से मानव मांस का सेवन करती थीं
— यह प्रथा भूख नहीं बल्कि विश्वास और व्यवस्था का प्रतीक थी।
कोरोवाई जनजाति और मानवशास्त्रीय साक्ष्य
पापुआ के दक्षिण-पूर्वी जंगलों में स्थित कोरोवाई जनजाति सबसे प्रसिद्ध उदाहरणों में से एक है।
यह जनजाति पेड़ों पर लगभग 100 फीट ऊँचे घर बनाकर रहती थी ताकि जंगली जानवरों और दुश्मन कबीले से बचाव हो सके। 1970 के दशक तक यह जनजाति बाहरी दुनिया के अस्तित्व से अनजान थी। स्थानीय इतिहास और यात्रियों के अनुसार, कोरोवाई लोग मानते थे कि किसी व्यक्ति की अप्राकृतिक मृत्यु “खाखुआ” नामक बुरी आत्मा या जादूगर के कारण होती है। जब किसी पर यह आरोप लगता था, तो उसे समुदाय की शांति के लिए धार्मिक अनुष्ठान में मार दिया जाता था और उसका मांस खाया जाता था।
यह कार्य क्रूरता नहीं बल्कि सामाजिक न्याय और आध्यात्मिक शुद्धिकरण का हिस्सा माना जाता था।
2000 के दशक के बाद से कोरोवाई जनजाति का बाहरी दुनिया से संपर्क बढ़ा और अब यह प्रथा पूरी तरह समाप्त हो चुकी है।
सरकार और वैश्विक दृष्टिकोण
इंडोनेशिया सरकार ने पापुआ की जनजातियों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू किए हैं,
साथ ही उनकी संस्कृति और पहचान का सम्मान बनाए रखने की कोशिश की है।
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कुछ गलत सूचनाओं के कारण दुनिया भर में इन जनजातियों की छवि को गलत तरीके से पेश किया गया है।
आधुनिक दृष्टिकोण और मानवीय सबक
आज इंडोनेशिया की जनजातियाँ यह दर्शाती हैं कि एक ही देश में धर्म, संस्कृति और सभ्यता के कितने अलग रूप एक साथ जीवित रह सकते हैं। यह जानकर भले ही हैरानी होती हो कि किसी समय ये जनजातियाँ मानव मांसाहार जैसी प्रथाओं में विश्वास रखती थीं,
लेकिन यह केवल ऐतिहासिक संदर्भ में समझने योग्य है, न कि आज की नैतिकता से।
पापुआ की यह कहानी हमें यह सिखाती है कि सभ्यता की विविधता ही मानव इतिहास की सबसे बड़ी ताकत है।
इंडोनेशिया की गहराइयों में आज भी यह विविधता जीवित है
— जो इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य हर परिस्थिति में अनुकूलन और अस्तित्व की राह खोज लेता है।
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