कोर्ट ने शादी न करने पर दायर दुष्कर्म मामले में आरोपी को बरी किया
एक महिला ने एक पुरुष के साथ कई बार संबंध बनाने के बाद उसे दुष्कर्म का आरोप लगाया था क्योंकि वह उससे शादी नहीं करना चाहता था। लेकिन अदालत ने सभी साक्ष्यों और परिस्थितियों को देखने के बाद आरोपी को दोषमुक्त कर दिया।

आपसी सहमति से चला रिश्ता
मुकदमे की जानकारी रखने वालों के अनुसार, महिला और पुरुष के बीच आपसी सहमति से रिश्ता था।
रिपोर्टों के मुताबिक, दोनों पक्ष कई बार एक-दूसरे के साथ निकटता से जुड़े और दोनों ने इसे सहमति से स्वीकार किया।
कानून और रिश्तों की जटिलता पर चर्चा
यह मामला समाज में विश्वास, सहमति और रिश्तों की अपेक्षाओं पर एक बड़ा सवाल उठाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि दुष्कर्म मामलों में सबसे जरूरी यह समझना है कि क्या उस समय दोनों पक्षों ने अपनी मर्जी से सहमति दी थी।
रक्षा पक्ष का दावा
ट्रायल में, आरोपी के वकीलों ने कहा कि दोनों के बीच रिश्ता पारस्परिक सहमति पर आधारित था।
उन्होंने बताया कि महिला ने दुष्कर्म का केस इसलिए किया क्योंकि वह शादी का वादा पूरा न होने पर नाराज थी।
गवाहों के बयानों और पत्राचार को सही ढंग से जांचा गया।
अभियोजन पक्ष का पक्ष
वहीं अभियोजन ने कहा कि पीड़िता ने दबाव में आकर आपसी संबंध बनाए और उसकी सहमति वास्तविक नहीं थी।
लेकिन अदालत ने पाया कि यह दावा सही साबित नहीं हो पाया।
अदालत का फैसला और सहमति की महत्ता
कानूनी तौर पर सहमति स्पष्ट होनी चाहिए, और इस मामले में दोनों ने सहमति दी थी।
व्यक्तिगत ग़लतफहमी या वादे टूटने के कारण आपराधिक कार्रवाई नहीं हो सकती।
सामाजिक प्रतिक्रियाएं
इस फैसले पर समाज के विभिन्न वर्गों की प्रतिक्रियाएं मिली-जुली रही हैं। कई लोग इसे स्पष्ट और स्वतंत्र सहमति के महत्व की पुष्टि मानते हैं, जबकि कुछ सामाजिक और मानसिक दबावों को भी ध्यान में रखने के पक्ष में हैं।
महिला अधिकार संगठनों की चिंताएं
महिला अधिकार संगठनों ने भी कानून के दुरुपयोग की आशंका जताई है।
वे मामलों की गहन जांच की मांग करते हैं ताकि पीड़ितों और आरोपी दोनों के अधिकार सुरक्षित रह सकें।
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समाजशास्त्रियों का दृष्टिकोण
विशेषज्ञ बताते हैं कि रिश्तों के मामले अक्सर भावनात्मक होते हैं और सामाजिक दबाव उन्हें और जटिल बनाते हैं, जिससे कानूनी निर्णय लेना मुश्किल होता है। इसलिए समझदारी, संवाद और सहमति को बढ़ावा देना ज़रूरी है।
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