Bangladesh Political Turmoil: आखिर क्यों सुलग रहा है बांग्लादेश?
पिछले कुछ समय से Bangladesh लगातार राजनीतिक और सामाजिक अशांति की खबरों में बना हुआ है। सड़कों पर तनाव, संस्थानों पर सवाल और समाज में गहरी बेचैनी—ये सब मिलकर एक ऐसे संकट की तस्वीर पेश करते हैं, जिसे समझना आसान नहीं है। इसी बीच निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका Taslima Nasreen का बयान सामने आया है, जिसने इस पूरे घटनाक्रम को एक बिल्कुल अलग नजरिए से देखने की चुनौती दी है।

Bangladesh political turmoil: “यह हसीना और यूनुस का संघर्ष नहीं है”
तसलीमा नसरीन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि बांग्लादेश में जो कुछ हो रहा है, उसे अक्सर सतही तौर पर समझा जा रहा है। उनके शब्दों में यह न तो Sheikh Hasina और Muhammad Yunus के बीच का टकराव है, न ही यह अवामी लीग और बीएनपी का पारंपरिक राजनीतिक संघर्ष है।
उन्होंने यह भी साफ किया कि यह संकट न हिंदू-मुस्लिम विवाद है, न सांस्कृतिक संगठनों और अपराधियों के बीच की लड़ाई। उनके अनुसार, असली कारण कहीं ज्यादा गहरा और चिंताजनक है।
तो फिर असली वजह क्या है?
तसलीमा नसरीन का कहना है कि बांग्लादेश लंबे समय से असंतोष की आग में जल रहा है।
यह आग किसी एक घटना से नहीं, बल्कि वर्षों से जमा होती चली आ रही समस्याओं से भड़की है।
उनके मुताबिक, यह संकट पैदा हुआ है:
- अभिव्यक्ति की आज़ादी के लगातार सीमित होने से
- असहमति को दबाने की प्रवृत्ति से
- बौद्धिक और सांस्कृतिक आवाज़ों के हाशिए पर जाने से
- डर के माहौल में जीने की मजबूरी से
यानी समस्या सत्ता बदलने या चेहरों की नहीं, बल्कि प्रणाली और सोच की है।
राजनीति से आगे की बात
अक्सर बांग्लादेश की स्थिति को केवल राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है – कौन सत्ता में है, कौन विरोध में।
लेकिन तसलीमा नसरीन मानती हैं कि यह संकट राजनीति से आगे निकल चुका है।
उनके अनुसार, जब समाज में सवाल पूछने वालों को देशद्रोही कहा जाने लगे, जब लेखक-पत्रकार सुरक्षित महसूस न करें, और जब आम नागरिक डर के साए में जीने लगे, तब अशांति का रूप केवल राजनीतिक नहीं रहता, वह सामाजिक संकट बन जाती है।
धर्म और पहचान का सवाल नहीं
एक अहम बात जो तसलीमा नसरीन ने स्पष्ट की, वह यह कि इस अशांति को धार्मिक रंग देना गलत है। उन्होंने लिखा कि यह न हिंदुओं और मुसलमानों के बीच का संघर्ष है और न ही किसी एक समुदाय के खिलाफ दूसरे की साजिश।
उनके अनुसार, असली टकराव है स्वतंत्र सोच और डर की राजनीति के बीच।
जब डर हावी हो जाता है, तब समाज के हर वर्ग में बेचैनी फैलती है।
निर्वासन से बोला गया सच
तसलीमा नसरीन खुद लंबे समय से निर्वासन में जीवन जी रही हैं। उनका कहना है कि बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति उन्हें उसी दौर की याद दिलाती है, जब सवाल पूछना सबसे बड़ा अपराध बन गया था।
उनकी बातों में दर्द भी है और चेतावनी भी – कि अगर असंतोष की जड़ों को नहीं समझा गया, तो हालात और बिगड़ सकते हैं।
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दुनिया के लिए संदेश
तसलीमा नसरीन का यह बयान केवल बांग्लादेश के लिए नहीं, बल्कि दुनिया भर के लोकतांत्रिक समाजों के लिए एक संदेश है। वह याद दिलाती हैं कि:
- सत्ता से ज्यादा जरूरी संस्थाएं होती हैं
- शांति का आधार डर नहीं, संवाद होता है
- और असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, ताकत होती है
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