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Indian Taxpayers Social Security System: जब टैक्स देने वाला ही सबसे असहाय रह जाता है

एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर, सालाना पैकेज 43 लाख रुपये। पिछले 5 साल में 30 लाख रुपये आयकर के रूप में सरकार को दिए। फिर अचानक – लेऑफ।
न नौकरी, न आय, न कोई सुरक्षा। शुरुआत में उसने अपनी बचत से घर चलाया। कुछ महीनों तक सब संभलता रहा। लेकिन जब सेविंग खत्म हुई, तो केवल आर्थिक संकट नहीं आया – डिप्रेशन ने घेर लिया। सवाल सिर्फ नौकरी का नहीं था, सवाल था सिस्टम का।

Indian taxpayers social security system

Indian taxpayers social security system: टैक्स दिया, लेकिन बदले में क्या मिला?

यह कहानी किसी एक व्यक्ति की नहीं है। भारत में लाखों ऐसे प्रोफेशनल और छोटे कारोबारी हैं जो:

  • पूरी ईमानदारी से टैक्स देते हैं
  • कभी सरकारी सब्सिडी नहीं लेते
  • किसी योजना की लाइन में नहीं लगते

लेकिन जैसे ही मुश्किल समय आता है, सिस्टम उनसे कहता है—“खुद संभाल लो”


अमेरिका बनाम भारत: फर्क कहां है?

अगर यही स्थिति United States में होती, तो तस्वीर अलग होती।
वहां टैक्स देने वाले नागरिकों को:

  • Unemployment Benefits
  • Social Security Allowance
  • नौकरी मिलने तक सरकारी सहायता

मिलती है। यानी टैक्स सिर्फ लेना नहीं, सुरक्षा का अनुबंध भी है।

वहीं India में टैक्स देने वाले के लिए कोई ठोस सोशल सिक्योरिटी सिस्टम नहीं है।


फ्री सुविधाएं किसके लिए?

आज भारत में कई योजनाएं चल रही हैं, जिनके तहत:

  • मुफ्त बिजली
  • मुफ्त पानी
  • मुफ्त बस यात्रा
  • मुफ्त राशन
  • नकद सहायता

दी जाती है। उदाहरण के तौर पर Ladli Behna Yojana जैसी योजनाएं।

इन योजनाओं का उद्देश्य गरीबों की मदद करना है – यह जरूरी भी है।

लेकिन सवाल यह है कि: जो लोग पूरी ज़िंदगी टैक्स देते हैं, उनके लिए क्या है?


सेल्फ-एम्प्लॉयड की सबसे बड़ी त्रासदी

भारत में एक बड़ा वर्ग Self-Employed लोगों का है:

  • छोटे व्यापारी
  • फ्रीलांसर
  • कंसल्टेंट
  • प्रोफेशनल्स

ये लोग:

  • जीवन भर टैक्स देते हैं
  • न पेंशन पाते हैं
  • न बेरोज़गारी भत्ता
  • न बीमारी या संकट में सरकारी सहायता

उनके लिए कोई सुरक्षा जाल नहीं है।


कोविड में क्या मिला?

कोविड-19 महामारी के दौरान:

  • नौकरीपेशा लोगों की नौकरियां गईं
  • व्यापार बंद हुए
  • इनकम शून्य हो गई

लेकिन टैक्स देने वाले मध्यम वर्ग को क्या मिला?

  • न सीधा कैश सपोर्ट
  • न नियमित सहायता
  • न मानसिक स्वास्थ्य का सहारा

उल्टा, EMI, टैक्स और खर्च – सब जारी रहे।


इज्जतदार लोग भीख मांगना नहीं जानते

सबसे कड़वी सच्चाई यही है। जो लोग आत्मसम्मान से जीते हैं, वे:

  • सरकारी दफ्तरों में हाथ नहीं फैलाते
  • योजनाओं की लाइन में नहीं लगते
  • सिस्टम से उम्मीद नहीं रखते

और शायद इसी वजह से सिस्टम भी उन्हें भूल जाता है

जबकि मुफ्तखोरी करने वाले हर योजना का लाभ उठा लेते हैं।


क्या टैक्स देना गलती है?

यह सवाल अब कई लोगों के मन में उठ रहा है।

अगर टैक्स देने के बावजूद:

  • नौकरी जाने पर कोई सहारा नहीं
  • बीमारी में कोई मदद नहीं
  • बुढ़ापे की कोई गारंटी नहीं

तो फिर टैक्स और नागरिक के बीच का रिश्ता क्या है?

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समाधान क्या हो सकता है?

भारत को गंभीरता से सोचना होगा:

  • टैक्सपेयर्स के लिए Unemployment Support
  • सेल्फ-एम्प्लॉयड के लिए Basic Social Security
  • योगदान आधारित पेंशन और सुरक्षा योजना

टैक्स सिर्फ दंड नहीं, विश्वास का समझौता होना चाहिए।

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